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Wednesday, 25 May 2016

जनवादी लेखक संघ द्वारा आयोजित लोकार्पण एवं परिचर्चा कार्यक्रम


लखनऊ 24 अगस्त 2014 कैफ़ी आज़मी सभागार, निशातगंज में जनवादी लेखक संघ के तत्वाधान में वरिष्ठ लेखक एवं संपादक डॉ गिरीश चन्द्र श्रीवास्तव की अध्यक्षता एवं डॉ संध्या सिंह के कुशल सञ्चालन में बृजेश नीरज की काव्यकृति ‘कोहरा सूरज धूप’ एवं युवा कवि राहुल देव के कविता संग्रह ‘उधेड़बुन’ का लोकार्पण एवं दोनों कृतियों पर परिचर्चा का कार्यक्रम आयोजित किया गया|

कार्यक्रम के आरम्भ में प्रख्यात समाजवादी लेखक डॉ यू.आर. अनंतमूर्ति को उनके निधन पर दो मिनट का मौन रखकर श्रद्धांजलि दी गयी| मंचासीन अतिथियों में युवा कवि एवं आलोचक डॉ अनिल त्रिपाठी, जलेस अध्यक्ष श्री अली बाकर जैदी, समीक्षक श्री चंद्रेश्वर, युवा आलोचक श्री अजित प्रियदर्शी ने कार्यक्रम में दोनों कवियों की कविताओं पर अपने-अपने विचार व्यक्त किए| परिचर्चा में सर्वप्रथम कवयित्री सुशीला पुरी ने क्रमशः बृजेश नीरज एवं राहुल देव के जीवन परिचय एवं रचनायात्रा पर प्रकाश डाला| तत्पश्चात राहुल देव ने अपने काव्यपाठ में ‘भ्रष्टाचारम उवाच’, ‘अक्स में मैं और मेरा शहर’, ‘हारा हुआ आदमी’, ‘नशा’, ‘मेरे सृजक तू बता’ शीर्षक कविताओं का वाचन किया| बृजेश नीरज ने अपने काव्यपाठ में ‘तीन शब्द’, ‘क्या लिखूँ’, ‘चेहरा’, ‘दीवार’ कविताओं का पाठ किया|

परिचर्चा में युवा आलोचक अजित प्रियदर्शी ने राहुल देव की कविताओं पर अपनी बात रखते हुए कहा कि राहुल की कविताओं में प्रश्नों की व्यापकता की अनुभूति होती है| यही प्रश्न उनकी उधेड़बुन को प्रकट करते हैं| राहुल अपनी छोटी कविताओं में अधिक सशक्त हैं| राहुल अपनी कविताओं में जीवन को जीने का प्रयास करते हैं| डॉ अनिल त्रिपाठी ने अपने वक्तव्य में सर्वप्रथम बृजेश नीरज की रचनाधर्मिता पर अपने विचार प्रकट किए- बृजेश नीरज की कृति समकालीन कविता के दौर की विशिष्ट उपलब्धि है| उनकी कविताओं में लय, कहन, लेखन की शैली दृष्टिगोचर होती है| वे अपना मुहावरा स्वयं गढ़ते हैं| इस काव्य संग्रह का आना इत्तेफ़ाक हो सकता है किन्तु अब यह समकालीन हिंदी कविता की आवश्यकता है| राहुल की छोटी कविताएँ बहुत महत्त्वपूर्ण हैं| चंद्रेश्वर पाण्डेय ने कहा कि- राहुल देव की कविताओं में तत्सम शब्दों का अधिक प्रयोग खटकता है| राहुल ने अपनी कविताओं में शब्दों को अधिक खर्च किया है, उन्हें इतना उदार नहीं होना चाहिए| कहीं-कहीं पर अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग हिंदी साहित्य में भाषा की विडंबना को परिलक्षित करता है| बृजेश नीरज संक्षिप्तता के कवि हैं, प्रभावशाली हैं| अपनी पत्नी के नाम को अपने नाम के साथ जोड़कर उन्होंने एक नया उदाहरण प्रस्तुत किया है| उनकी रचनाधर्मिता सराहनीय है|

अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में डॉ गिरीश चन्द्र श्रीवास्तव ने कार्यक्रम संयोजक डॉ नलिन रंजन सिंह को साधुवाद देते हुए कहा कि जब मानवीय संवेदनाएँ सूखती जा रही हैं ऐसे समय में ऐसी सार्थक बहस का आयोजन एक ऐतिहासिक क्षण है जिसमें श्री नरेश सक्सेना और श्री विनोद दास जैसे गणमान्य साहित्यकार उपस्थित हों| राहुल की कृति ‘उधेड़बुन’ एक युवा कवि के अंतस का प्रतिबिम्ब है| एक छटपटाहट लिए यह संग्रह एक महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है| यह समाज के बनावटी जीवन को उद्घाटित करता है| ‘उधेड़बुन’ रोमांटिक प्रोटेस्ट का कविता संग्रह है| बृजेश नीरज की कृति ‘कोहरा सूरज धूप’ में गंभीरता है| यह एक ऐसे सत्य की खोज़ है जिसमें जीवन के उच्चतर आदर्शों की उद्दामता है, मानवतावाद का बोध कराने की सामर्थ्य है| आज के सन्दर्भों में यह दोनों कृतियाँ महत्त्वपूर्ण और पठनीय हैं|

कार्यक्रम में संध्या सिंह, किरण सिंह, दिव्या शुक्ला, विजय पुष्पम पाठक, नरेश सक्सेना, डॉ कैलाश निगम, एस.सी. ब्रह्मचारी, श्री रामशंकर वर्मा, कौशल किशोर, अनीता श्रीवास्तव, डॉ गोपाल नारायण श्रीवास्तव, प्रदीप सिंह कुशवाहा, केवल प्रसाद सत्यम, धीरज मिश्र, सूरज सिंह सहित कई अन्य गणमान्य कवि एवं साहित्यकार उपस्थित रहे|

Saturday, 14 May 2016

लोकोदय आलोचना श्रंखला

पूँजी और सत्ता का खेल अब हिन्दी साहित्य में जोरों पर है। साहित्य जगत पर बाज़ार का प्रभाव अब स्पष्ट नज़र आता है। मठों और पीठों के संचालक, बड़े अफसर, पूँजी के बल पर साहित्य को किटी पार्टी में बदलने के इच्छुकपैकेजिंग और मार्केटिंग में माहिर दोयम दर्ज़े के रचनाकार पूरे साहित्यिक परिदृश्य पर काबिज होने के प्रयास में लगातार लगे रहते हैं। ऐसे रचनाकारों द्वारा खुद की खातिर स्पेस क्रिएट करने के लिए चुपचाप साहित्य कर्म में संलग्न लोकधर्मी साहित्यकारों को लगातार नज़रअंदाज़ करने, उनको हाशिए पर धकेलने की कोशिश की जाती रही है
  
हिन्दी में बहुत से कवि हैं जिनके लेखन पर मुकम्मल चर्चा नहीं की गयी हैऐसे बहुत से कवि हैं जिन्होंने वैचारिक पक्षधरता को बनाए रखते हुए लोक की अवस्थितियों व संघर्षों का यथार्थ खाका खींचा तथा सत्ता और व्यवस्था के विरुद्ध प्रतिरोध की भंगिमा अख्तियार की लेकिन उनके रचनाकर्म पर समुचित चर्चा नहीं हो सकी लोकोदय प्रकाशन ने ऐसे कवियों पर आलोचनात्मक  श्रंखला प्रकाशित करने का निर्णय लिया है। इस श्रंखला का नाम होगा लोकोदय आलोचना श्रंखला इस श्रंखला के प्रथम कवि के रूप में  वरिष्ठ कवि तथा पत्रकार सुधीर सक्सेना के व्यक्तित्व, कृतित्व व काव्य रचना प्रक्रिया पर एक संपादित पुस्तक का प्रकाशन किया जाएगा किताब का संपादन किया जाएगा। इस पुस्तक का सम्पादन प्रद्युम्न कुमार सिंह और उमाशंकर सिंह परमार करेंगे

इस पुस्तक के लिए आलेख आमन्त्रित हैं। इच्छुक लेखक वर्ड फाइल के रूप में कृतिदेव या यूनिकोड फॉण्ट में अपने आलेख परिचय तथा नवीनतम फोटो के साथ इस ई-मेल पर ३० मई २०१६ तक भेज सकते हैं

आलेख भेजते समय यह उल्लेख अवश्य करें कि आलेख सुधीर सक्सेना पर केन्द्रित पुस्तक के लिए भेजा जा रहा है    

Friday, 13 May 2016

हमारी सेवाएँ

लोकोदय प्रकाशन सीधे पाठक तक पुस्तकें पहुँचाने के लिए दृढ संकल्पित हैं पाठकों तक सीधी पहुँच बनाने के लिए हम इंटरनेट के माध्यमों सोशल मीडिया (वेबसाईट, फेसबुक, ट्विटर, लिंकेडिन, गूगल+ आदि), ऑनलाइन बिक्री की साइट्स (अमेज़न, इ-बे, शॉपक्लूज़, आदि) तथा अन्य भौतिक माध्यमों (पुस्तक बिक्री केंद्र, पुस्तक मेला, साहित्यिक आयोजन आदि) का प्रयोग करेंगे इनके साथ-साथ अन्य माध्यमों में लगातार और मजबूत होने के लिए संकल्पित हैं   

पुस्तक के वितरण के लिए हमारे पास उच्च कोटि की व्यवस्था है जिसमें इंटरनेट के सभी प्रतिष्ठित माध्यम सम्मिलित हैं
-अमेज़न.इन, फ्लिप्कार्ट.कॉम, ईबे.इन, सिम्पली.कॉम, पेटीएम्.कॉम, शॉपक्लूज़.कॉम, इंडियाबुक स्टोर.इन सहित तमाम मर्चेंट वेब साईट से पाठक लोकोदय प्रकाशन से प्रकाशित पुस्तकें खरीद सकते हैं


उच्च कोटि की लाजिस्टिक्स सर्विस कंपनी से अनुबंध होने के कारण हम भारत की
प्रतिष्ठित कोरियर कंपनी द्वारा पाठक तथा पुस्तक खरीदार को शानदार डाक सेवा प्रदान करते हैं     

लोकोदय साहित्य श्रंखला

लोकधर्मी साहित्यिक परम्परा से समकाल को जोड़ना आज के समय की जरूरत है इसलिए लोकोदय प्रकाशन द्वारा 'लोकोदय साहित्य श्रृंखला' प्रारम्भ करने का निर्णय लिया गया है। इसके अन्तर्गत लोकधर्मी कविता, लोकगीत, लोककथा, लोककला इत्यादि पर आधारित संकलन प्रकाशित किए जाएँगे। इस श्रृंखला का प्रारम्भ लोकधर्मी कविताओं के साझा संकलन के रूप में किया जाएगा।
लोकधर्मी कविताओं के साझा संकलनों की इस श्रृंखला का नाम 'कविता आज' होगा। इसके हर खण्ड में दो भूमिकाओं के साथ 21 महत्वपूर्ण लोकधर्मी कवियों की पाँच-पाँच कविताएँ, उनके परिचय तथा आलोचकीय टीप के साथ सम्मिलित होंगी।
'कविता आज-1' में सम्मिलित किए जाने वाले कवियों के नामों पर विचार कर लिया गया है। इस संग्रह के लिए नये और पुरानों कवियों के योग का ध्यान रखा गया है । 'कविता आज-1' में सम्मिलित होने वाले कवि हैं-विजेन्द्र, सुधीर सक्सेना, अनिल जनविजय, नासिर अहमद सिकन्दर, कुअँर रवीन्द्र, नवनीत पांडेय, मणिमोहन मेहता, बुद्धिलाल पाल, शहंशाह आलम, सन्तोष चतुर्वेदी, भरत प्रसाद, महेश पुनेठा, बृजेश नीरज, प्रेमनन्दन,अरुण श्री, रश्मि भरद्वाज, भावना मिश्रा, पीके सिंह, नरेन्द्र कुमार, नारायण दास गुप्त और शम्भु यादव।

'कविता आज' का सम्पादन उमाशंकर परमार और अजीत प्रियदर्शी करेंगे।

Tuesday, 10 May 2016

समकालीन कविता कार्यक्रम की रिपोर्ट

प्रेस रिपोर्ट

आज दिनांक 08/05/2016 को लोकोदय प्रकाशन और अम्र भारती साहित्य एवं संस्कृति संस्थान के संयुक्त तत्वावधान में समकालीन कविता पर एक दिवसीय कार्यक्रम का आयोजन किया गया. कार्यक्रम का प्रारम्भ वरिष्ठ कवि-चित्रकार कुँवर रवीन्द्र के कविता-पोस्टरों की प्रदर्शनी के उदघाटन से हुआ. प्रदर्शनी का उदघाटन वरिष्ठ कथाकार गिरीश चन्द्र श्रीवास्तव ने किया. इसके उपरान्त बृजेश नीरज की पुस्तक राजनीति के रंग तथा प्रदीप कुशवाहा की पुस्तक खुलती परतें का लोकार्पण नरेश सक्सेना, डॉ. धनञ्जय सिंह तथा कुँवर रवीन्द्र द्वारा किया गया.
कार्यक्रम के दूसरे सत्र में समकालीन कविता में हाशिए के सवाल विषय पर चर्चा हुई. इस परिचर्चा में वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना, वरिष्ठ नवगीतकार डॉ. धनञ्जय सिंह, उ.प्र. जलेस के कार्यकारी सचिव तथा आलोचक नलिन रंजन सिंह, जलेस लखनऊ के सचिव अजीत प्रियदर्शी तथा युवा आलोचक उमा शंकर सिंह परमार ने प्रतिभाग किया.
कार्यक्रम के अंतिम सत्र में ५० कवियों का कविता पाठ हुआ. इसमें सम्मिलित होने वाले प्रमुख कवि थे डॉ. मधुकर अस्थाना, संध्या सिंह, शिशिर सागर, संतोष चतुर्वेदी, बृजेश नीरज, राहुल देव, भावना मिश्र, सुशीला पुरी, सोनी पाण्डेय, राजेन्द्र वर्मा, दिनेश त्रिपाठी शम्स, राहुल देव, तरुण निशान्त, राम शंकर वर्मा, धीरज मिश्र.

                                                           लोकोदय प्रकाशन

ई-मेल- lokodayprakashan@gmail.com

Tuesday, 3 May 2016

बृजेश नीरज


नाम- बृजेश नीरज
पिता- स्व0 जगदीश नारायण सिंह गौतम
माता- स्व0 अवध राजी
जन्मतिथि- 19-08-1966
जन्म स्थान- लखनऊ, उत्तर प्रदेश
ईमेल- brijeshkrsingh19@gmail.com
निवास- 65/44, शंकर पुरी, छितवापुर रोड, लखनऊ-226001
सम्प्रति- उ0प्र0 सरकार की सेवा में कार्यरत
कविता संग्रह- कोहरा सूरज धूप 
साझा संकलन-त्रिसुगंधि’ (बोधि प्रकाशन), ‘परों को खोलते हुए-1’ (अंजुमन प्रकाशन), क्योंकि हम जिन्दा हैं (ज्ञानोदय प्रकाशन), ‘काव्य सुगंध-२ (अनुराधा प्रकाशन), अनुभूति के इन्द्रधनुष (अमर भारती)
संपादन- कविता संकलन- सारांश समय का
        अर्द्धवार्षिक पत्रिका- कविता बिहान में सह सम्पादक
        मासिक ई-पत्रिका- ‘शब्द व्यंजना के सम्पादक
सम्मान- विमला देवी स्मृति सम्मान २०१३
विशेष- जनवादी लेखक संघ, लखनऊ इकाई के कार्यकारिणी सदस्य 

केवल प्रसाद सत्यम


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उमा शंकर सिंह परमार



नाम – उमाशंकर सिंह परमार
काम- पढना, लिखना, समाज सेवा, किसान आन्दोलन से जुडाव, जनवादी लेखक संघ उत्तर प्रदेश का सदस्य 
विधा- आलोचना, कभी कभार कविता
प्रकाशन –  हिंदी की प्रमुख पत्रिकाओं जैसे कृति ओर, हिमतरु, नयापथ, हंस, प्रयाग पथ, सप्तपर्णी, दुनिया इन दिनों, प्रसंग, स्वाधीनता, वर्तमान साहित्य, जनपथ, लहक, जागरण, रस्साकसी,  गाथांतर, आदि में आलेखों का प्रकाशन|
 महत्वपूर्ण ब्लॉगों में प्रकाशन, लोकविमर्श ब्लॉग एवं आलोचना पत्रिका का लोकविमर्श का संपादन, गाथांतर के समकालीन कविता अंको का संपादन 
पता – द्वारा रमेश चन्द्र रस्तोगी, कालेज गेट के सामने, बाँदा रोड बबेरू, जनपद बाँदा २१०१२१

फोन – ०९८३८६१०७७६ 

Sunday, 1 May 2016

संध्या सिंह


नाम ---- संध्या सिंह
जन्म – २० जुलाई १९५८
जन्म स्थान – ग्राम लालवाला, तहसील देवबंद, जिला सहारनपुर.
 शिक्षा  ---- स्नातक विज्ञान मेरठ विश्वविद्यालय
सम्प्रति  -- कुछ पत्र पत्रिकाओं में नियमित लेखन, हिन्दी के प्रचार प्रसार से जुडी साहित्यिक गतिविधियों में एवं काव्य पाठ में निरंतर सहभागिता, दूरदर्शन पर भी काव्य पाठ एवं कई पत्रिकाओं के परामर्श मंडल में सम्पादन सहयोग, इसके अतिरिक्त स्वतन्त्र लेखन |
प्रकाशित पुस्तकें -- ---- एक साझा संकलन कविता समवेत परिदृश्य काव्य संग्रह का सह संपादन, एक प्रकाशित काव्य संग्रह आखरों के शगुन पंछी‘. इसके अतिरिक्त सह संपादन में एक साझा संकलन ‘इत्र महकता मन का प्रकाशनाधीन एवं एक अपना गीत संग्रह ‘मौन की झंकार‘ प्रकाशनाधीन|