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Sunday, 5 March 2017

नागार्जुन की कविताएँ

भूल जाओ पुराने सपने 

सियासत में 
न अड़ाओ 
अपनी ये काँपती टाँगें 
हाँ, मह्राज,
राजनीतिक फतवेवाजी से 
अलग ही रक्खो अपने को 
माला तो है ही तुम्हारे पास 
नाम-वाम जपने को
भूल जाओ पुराने सपने को
न रह जाए, तो-
राजघाट पहुँच जाओ
बापू की समाधि से जरा दूर 
हरी दूब पर बैठ जाओ
अपना वो लाल गमछा बिछाकर 
आहिस्ते से गुन-गुनाना :
‘‘बैस्नो जन तो तेणे कहिए 
जे पीर पराई जाणे रे’’
देखना, 2 अक्टूबर के 
दिनों में उधर मत झाँकना
-जी, हाँ, महाराज !
2 अक्टूबर वाले सप्ताह में 
राजघाट भूलकर भी न जाना
उन दिनों तो वहाँ 
तुम्हारी पिटाई भी हो सकती है 
कुर्ता भी फट सकता है 
हां, बाबा, अर्जुन नागा !



स्वगत: 

आदरणीय,
अब तो आप 
पूर्णतः मुक्त जन हो !
कम्प्लीट्ली लिबरेटेड...
जी हाँ कोई ससुरा 
आपकी झाँट नहीं 
उखाड़ सकता, जी हाँ !!
जी हाँ, आपके लिए 
कोई भी करणीय-कृत्य 
शेष नहीं बचा है
जी हाँ, आप तो अब
इतिहास-पुरुष हो 
...
स्थित प्रज्ञ—
निर्लिप्त, निरंजन...
युगावतार !
जो कुछ भी होना था 
सब हो चुके आप !
ओ मेरी माँ, ओ मेरे बाप !
आपकी कीर्ति-