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Monday, 17 July 2017

एक पाठकीय टिप्पणी

पाठक का रोजनामचा उमाशंकर सिंह परमार की ऐसी किताब है जिसमें समकालीन युवा कथाकारों,कवियों की कुछ पुस्तकों व भक्तिकाल और आदिकाल की युगीन विशेषताओं को लेकर पाठ किया गया है।यह किसी आलोचक की किताब से ज्यादा एक पाठक की किताब है जिसके अंतर्गत आप समझ सकते हैं कि एक पाठक अपनी समझ के अनुसार कृति और कृतिकार को कैसे परखता है।आप इसे एक अभिनव प्रयास भी कह सकते हैं।इस दृष्टि से हमें रचनाकार के व्यक्तित्व व उसकी कृति की सामयिक उपादेयता पर सोचने का नजरिया प्राप्त होता है।यदि हम किसी बंधी बंधाई अवधारणा के सहारे किसी लेखक पर विमर्श करते हैं तो कहीं न कहीं लेखक के मानस व उसकी निजी सोच को उपेक्षित कर रहे होते हैं।आप इस किताब के माध्यम से किसी आलोचक को नहीं बल्कि किसी आलोचक के भीतर बैठे उसके पाठक को जान सकते हैं।इस रूप में यह पुस्तक एक नई पहल है।

इस किताब में अध्याय-8 के अंतर्गत  मेरी काव्यपुस्तक कुशीनारा से गुजरते के बारे में  विस्तार से पाठकीय दृष्टि के अनुसार चर्चा की गयी है।

उमाशंकर सिंह परमार की यह पुस्तक  हिंदी आलोचना के परम्परागत निकषों से अलहदा एक उल्लेखनीय और विनम्र शुरुआत है।

- राजकिशोर राजन 

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