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Wednesday, 19 July 2017

ऐतिहासिक मौलिकता की भव्य दुर्बलता


सजग और भावनाशील मनुष्य का मस्तक अनोखे और अनजाने विचारों का अखाड़ा है। विचार तो उनके भी मस्तक में कोलाज की तरह जमे रहते हैं, जो साधारण जीवन जीते हैं जो बेखासियत की मायूसी में सारा जीवन स्वाहा कर देते हैं। यदि साढ़े तीन फीट के इस ढांचे में विद्युती कल्पना खिंच गयी, यदि कदम कदम पर बेलीक सोच का अनहदपन चमकने लगा, यदि इंच-दर-इंच के यथार्थ को रहस्य की नजरों से देखने की आदत विकसित हो गयी तो आदमी अपनी सजगता के पागलपन में जीवन पर्यन्त रोने के लिए अभिशप्त रहे। दर्शन, मनोविज्ञान और सृजन सामान्य मनो मस्तिष्क वाले व्यक्ति के अन्तर्जगत का उद्घाटन तो कर सकते हैं, किन्तु अनुभूति, कल्पना, सजगता और तीक्ष्ण बुद्धि से लबरेज मनुष्य के भीतरी आयतन का एक्स-रे करना इन तीनों के द्वारा भी संभव नहीं।
    कवि मुक्तिबोध के मस्तिष्क की श्रेणी यदि तय करनी हो तो हमें कबीर, निराला और नागार्जुन के मनोजगत की ओर चलना होगा। जीवन भर कह-कहकर भी न जाने क्या-क्या न कह पाने की अहक जैसे इन कवियेां में बनी रही, कुछ वैसे ही मुक्तिबोध के भीतर। कल्पना कीजिए यदि 47 वर्ष की उम्र का यह विलक्षण कवि अस्सी या नब्बे साल की उम्र को छू लिया होता, तो हिन्दी कविता का कैसा शिखर खड़ा होता। मुक्तिबोध का मस्तिष्क एक मिसाल है कि प्रकृति बिना किसी भेदभाव के, बिना समय की परवाह किए कहीं भी, किसी भी कोने में सृजन के एक से बढ़कर एक आश्चर्यों को उत्पन्न करती है। मौके पर एक बात यहीं कह देना जरूरी है कि जिस तरह मुक्तिबोध को मुक्तिबोध ने नहीं, इस सृष्टि, प्रकृति और पृथ्वी ने बनाया उसी तरह कई और जीनियस जन्म लेंगे इस सृष्टि के प्रांगण में कई शताब्दियों तक।
    कवि मुक्तिबोध के दिमाग का ताना-बाना उनके समय के जटिलतम मस्तिष्क वाले सर्जकों का माॅडल था। उनमें असीमता की भूख थी, सर्वस्व आत्मसात करने की तड़प थी और अभिव्यक्ति की मानवीय सीमाएं तोड़ देने की सनक। इसीलिए मुक्तिबोध आधुनिक कविता ही नहीं समूची हिन्दी काव्य परम्परा के कठिनतम कवियों में गिने गए। आगे की पंक्तियों में खोजिए उनके चेतनाकाश का ओर-छोर-सहसा स्वचेत हम हुए कि लहराई अजीब। जग भर को जी में भर लेने की आहट/ मैं क्या न करूँ, क्या कर डालूँ, सब कुछ कर लूँ/ के भावों की/ अपने ही कानों में आहट।’ (भूरी-भूरी खाक धूल)
दुनिया की हर भाषा का जीनियस सर्जक सबसे विवश व्यक्तित्वों में से एक होता है। समय की लाखों जटिलताओं, तनाव, आतंक और विसंगतियों के चक्र की चिंता इस कदर कि उसकी भयावहता के आगे लाचार। व्यक्ति-व्यक्ति में छुपी हुई, भरी हुई, सड़ी हुई, धंसी हुई दानवता के रंग इतना ज्यादा कि उसके आगे बेवश।
मुक्तिबोध युगान्तकारी कल्पनाशीलता और असाधारण चिंतन के मालिक थे। इसके लिए उन्हें किसी प्रयास की जरूरत न थी, बल्कि प्रकृति ने सहज ही उन्हें ऐसा ढांचा सौंप दिया था, जिसमें ऐसा कर पाना मुक्तिबोध के लिए सहज साध्य था। अपनी प्राकृतिक क्षमता में बेजोड़ होने के बावजूद मुक्तिबोध उसकी अभिव्यक्ति करते समय उलझ जाते थे, बिखराव आ जाता था यों कहें कि अपनी परम अनुभूतियों के प्रकाशन पर पूरा अधिकार नहीं जमा पाते थे।
यह अकारण नहीं कि उन्होंने अपनी प्रखर कल्पना प्रवणता को तुष्ट करने के लिए फैंटेसी शिल्प का दामन थामा, जिसके कारण हिन्दी कविता की प्रशस्त जमीन पर उनकी धाक जम गयी। किन्तु यह फैंटेसी भी कवि को उनकी अनुभूतियों की सफलतम अभिव्यक्ति का पारंगत कलाकार न बना सकी। एक तड़फड़ाता हुआ उलझाव, उच्चस्तरीय दुहराव और बहुत कुछ खो जाने की परेशानी उनकी अधिकांश कविताओं में बार-बार दिखाई देती है। मुक्तिबोध लगातार अपने अंतर्व्यक्तित्व को साकार करने के लिए अपने भौतिक शरीर से लड़ रहे थे। उसमें वह तराश, वह विद्युतपन वह चैतन्यता लाना चाह रहे थे कि समूचा ढांचा उनकी अन्तस्थ प्रतिभा के विस्फोट का लांचिग पैडबन जाय। ऐसा कर पाने की जी तोड़ कोशिश में ही वे महान शिल्पकार बन पाए। मुक्तिबोध माक्र्सवाद, बर्गसां, फ्रायड के दर्शनालोक में सृजन यात्रा की रहस्यमय दिशाएं तय कर रहे थे। सघन उलझाव से परिपूर्ण उनकी कविताओं से जूझना हो तो कुछ पंक्तियां रखी जा सकती हैं- अन्तर-भार-नम्रा देवदारू-डगार के नीचे/ झुके हम और अंजलि भर/ लगे पीने/ तुम्हारे साथ/ उस झरते हुए जल रूप/ द्युति-निष्कर्ष को/ कि इतने में गहन गंभीर नीली घन घटाओं की/ नभोभेदी चमकती गड़गड़ाहट सी हुई/ अन्तर्गुहाएँ खोल मुँह चिल्ला उठीं (भूरी-भूरी खाक धूल)। अभिव्यक्ति के चिर-परिचित और परम्परागत तौर तरीकों से मुक्तिबोध का विश्वास उठ चुका था। वे अभिव्यक्ति में कठिन और उलझाऊ शिल्प का खतरा मोल लेते हुए भी शिल्प में मौलिकता भरने को उद्धत थे। कामायनीके स्थापत्यकार जयशंकर प्रसाद ने उनकी इस महत्वाकांक्षा को आसान बना दिया। यह कहने में कोई संकोच नहीं कि मुक्तिबोध की अर्थगुंफित कविताओं में गुफा की दिशाओं की तरह उलझी-पुलझी, आड़ी-तिरछी, संकरी, रोमांचकारी वैचारिकता दशकों से पाठकों के लिए महा चुनौती बनी रही, जो किसी आदिम सभ्यता की अबूझ, दुर्बोध्य लिपि की तरह आज भी पहेली बनी हुई है। पुनः टकराइए नई पंक्तियों से और निकालिए एक सुलझा हुआ सटीक विचार-रक्तिम संघर्षों की घाटी के क्षितिज-तीर/ पर स्तब्ध धधकता हुआ लाल अंगार-चन्द्र मुस्कारा उठा/ हो गयी सुनहली स्मित विशाल/ जन संघर्षों की निर्णायक/ स्थिति आ पहुँची आकुल कराल/ पीड़ा के श्यामल महासिन्धु। (भूरी-भूरी खाक धूल, पृ. 217)
मुक्तिबोध की बेहद प्रारंभिक कविताएँ इस तथ्य को प्रमाणित करती हैं कि वे छायावादी चेतना से सर्वांगशः अनुप्राणित थे- मुख्यतः जयशंकर प्रसाद से। तारसप्तकमें संकलित उनकी सभी कविताएं, विशेष रूप से- मृत्यु और कविशीर्षक कविता छायावादी अंदाज की रचना है। यद्यपि बेचैनी, असंतोष, अन्तर्नाद और आत्ममंथन बिल्कुल आधुनिकता का रंग लिए हुए है- मगर लय, तुक, ताल और शब्द-प्रवाह पूर्णतः छायावादी। मुक्तिबोध शब्द चयन में जनवादी नहीं, समासवादी हैं, संस्कृत-शिल्पी हैं। उनकी यह विशुद्ध सघन भाषाई रूझान प्रारंभ से अंत तक बनी रही। उनकी बहुत गिनी-चुनी कविताएं ऐसी हैं, जो साधारण बोलचाल वाली हैं, जो दैनिक जीवन की भाषा को खुलकर अपनाए हैं। अगर दैनिक व्यवहार की हिन्दी आयी भी है तो बौद्धिक-शिक्षित वर्ग में बोली जाने वाली, न कि गाँव, अंचल, बस्तियों और जनसंकुल चैराहों पर बोली जाने वाली। इसका परिणाम यह हुआ कि जन की आत्मा, सपनों और रोम-रोम से एकाकार उनकी कविताएं लोक जुबान से रिक्त रहने के कारण लोक से कोसों दूर हो गईं और आज भी वे उतनी ही दूर हैं। सृजन और साहित्य के कर्मक्षेत्र में अभिनव प्रयोग करने को तत्पर नव सर्जकों के लिए मुक्तिबोध की कविताएं मिसाल हैं जरूर-मगर साधारण पाठकों के लिए स्वप्न में कौंधता रहस्य, जो आँख खुलते ही गायब हो जाता है। कभी निराला ने भी हिन्दी पाठकों को अपनी कविता के स्तर तक उठने की शर्त रखी थी, लगभग ऐसा ही कुछ मुक्तिबोध ने बिना कहे ही कहा। वे भी जन-जन की आत्मा, मन, बुद्धि, चेतना, कल्पना और व्यक्तित्व के जागरण के लिए जनता की जमीन पर नहीं उतरे उनकी जुबान, लहजा, मुहावरा, अनगढ़न और भदेस रसात्मकता से एकाकार नहीं हुए। बल्कि अपनी बौद्धिक अभिरूचि के अनुसार, अपनी अध्ययन सम्पन्न प्रकृति के अनुसार सघन वैचारिक मेधा की शर्तों पर अपनी संश्लिष्ट और दुर्बोध भाषा का निर्माण किया। हिन्दी कविता में मुक्तिबोध की भाषा अपने आप में एक अद्वितीय मानक है जरूर, मगर यही उनकी दुर्बलता का अकाट्य उदाहरण भी। दुनिया की किसी भी भाषा में कविता के एक से बढ़कर मानक शिखराकार हुए- मगर भाषा की जटिलता, गरिष्ठता और दुर्बोधता बहुत कम महाकवियों में पायी जाती है। उसी समय की दो शिखर-प्रतिभाएं अपनी सर्जनात्मकता के अनमोलपन से तत्कालीन दुनिया को चमत्कृत कर रही थी- परन्तु दोनेां की काव्य भाषा इतनी जमीनी, इतनी चिर-परिचित और हृदयग्राही कि हवा, पानी, अन्न की तरह भीतर जगह बना लेती हैं और व्यक्तित्व के विकास का अभिन्न कारण बन जाती हैं। वे कवि हैं- खलील जिब्रान और रवीन्द्रनाथ टैगोर। प्रमाण के लिए पेशे-नजर हैं उस्तादे कलम- खलील जिब्रान की कुछ पंक्तियाँ- यह जीवन है/ युगों से रंगमंच पर अभिनीत/ शताब्दियों से सांसारिकता द्वारा उल्लिखित/ वर्षों से अपरिचित अवस्था में स्थित/ दिनों से स्मृतियों के समान पठित/ केवल घड़ी भर के लिए परमपद को प्राप्त/ किन्तु यह घड़ी अनंत के लिए रत्न के समान अमूल्य है। (आंखू और मुस्कान)।
हिन्दी कविता के मोर्चे पर मुक्तिबोध का सबसे बड़ा योगदान फैंटेसी शिल्प का सर्जनात्मक प्रयोग है। यह फैंटेसी काॅलरिज जैसे अंग्रेजी शब्द साधकों के चिंतन में प्रस्फुटित होकर सामने आयी। आज भी इसकी कोई व्यवस्थित और सर्वमान्य सैद्धांतिकी निर्मित नहीं हो सकी है। मुक्तिबोध ने हिन्दी कविता का एक बुलन्द दरवाजा निर्मित अवश्य किया फैंटेसी शिल्प के द्वारा, मगर वह एक चेतना-शिल्पी के द्वारा उठाया गया प्राथमिक कदम ही माना जाएगा। फैंटेसी शिल्प का सर्जनात्मक शिखरत्व जितने सुन्दर रूप में कामायनी में चमकता है, शायद उतने उज्ज्वल स्वरूप में मुक्तिबोध की कविताओं में कम। कारण बहुत स्पष्ट है- मुक्तिबोध अपनी अर्जित भाषा, शब्दलाघव, तीक्ष्ण बुद्धि और चक्रवाती कल्पनाशीलता के बूते अनुभूतियों के जिस समुद्र के उस पार जाना चाहते थे- उसमें काफी कुछ सफल होते हुए भी, मजधार में बारम्बार उलझ जाते हैं। वे फैंटेसी जैसी दुधारी तलवार उठाकर यथार्थ की अन्तर्बाह्य संभावनाओं की खोज पर उड़ चले हैं, किन्तु जिस जटिल भाषा, अनजाने प्रतीकों और अबूझ रूपकों का प्रयोग वे बेधड़क करते हैं- उससे तो यही लगता है- फैंटेसी उनकी प्रतिभा पर हावी है न कि फैंटेसी पर वे। मुक्तिबोध की अधिकांश कविताओं में चिर-परिचित, सामान्य, परम्परागत कुछ भी नहीं- सब कुछ रोमांचक, अप्रत्याशित, हतप्रभ करने वाला। मुक्तिबोध को यह क्षमता मिली फैंटेसी शिल्प के बदौलत। जयशंकर प्रसाद अपनी कामायनी में भी बहुमुखी बेलीकपन की अलख जगाए हुए हैं- मगर वे चैंकाते नहीं, ठक्क नहीं करते, बल्कि सिर से पांव तक आप्लावित कर देते हैं, रस, गंध, ध्वनि, प्रतीक और बिम्ब की मौलिकता का ज्वारभाटा खड़ा कर देते हैं। फैंटेसी का दुस्साहसिक प्रयोग करके मुक्तिबोध ने एक शक्तिशाली हथियार की कला सिखायी, मगर इस शिल्प का नायाब प्रयोग अभी बहुत शेष है। यदि मुक्तिबोध इस शिल्प में छिपे चमत्कार को उसके चरम तक पहुंचा दिए होते, तो विश्व कविता में उन्हें ठीक वही कद हासिल हुआ होता, जो खलील जिब्रान, गेटे और रवीन्द्रनाथ को मिला। फैंटेसी जैसे इस्पाती शिल्प को आत्मसात करने के महत् प्रयत्न में मुक्तिबोध बेमिसाल भी बने और काफी हद तक कठिन रह जाने वाले कवि भी सिद्ध हो उठे।
मुक्तिबोध अपने समकालीनों से सर्वाधिक उत्कट् ईमानदारी के साथ आत्मसंघर्ष करने वाले सर्जक थे। जिद, असंतुष्टि और आत्महन्ता ईमानदारी ने ही मुक्तिबोध को कविता की घटना बना दिया। उनका दैनिक जीवन साधारण, उठा-पटक, खींचतान और बेअर्थ की झंझटों में उलझा हुआ। किन्तु मुक्तिबोध भीतर-भीतर एक कल्पनालोक को संवारने, तराशने में बेतरह भिड़ गये थे। निश्चय ही उनका संकल्प असाधारण था, चेतना अव्वल दर्जे की थी, कल्पना के बेहद्दीपन का कहना ही क्या, किन्तु जीवन की सड़ी कांटेदार, धुंआती हुई दुश्वारियों ने उन्हें साधारण मनुष्य से ऊपर न उठने दिया। यद्यपि मुक्तिबोध अपनी नैसर्गिक जीनियास्टी के अनुरूप खुद को तराशने के लिए बौखला उठते थे, मगर हर प्रयत्न में उन्हें हताशा मिली, पछाड़ मिली- वे टूटे, बिखरे-फिर दुबारा आत्मोत्थान के लिए तत्पर हुए। तार सप्तक के आत्म वक्तव्य में उनकी यह बेवशी गौर करने लायक है- ‘‘मेरे बालमन की पहली भूख सौंदर्य और दूसरी विश्व-मानव का सुख-दुख- इन दोनों का संघर्ष मेरे साहित्यिक जीवन की पहली उलझन थी। इसका स्पष्ट वैज्ञानिक समाधान मुझे किसी से न मिला। परिणाम था कि इन अनेक आन्तरिक द्वन्द्वों के कारण एक ही काव्य विषय नहीं रह सका। जीवन के एक ही बाजू को लेकर मैं कोई सर्वाश्लेषी दर्शन की मीनार खड़ी न कर सका।’ (तार सप्तक- पृ. सं. 21)
अपनी क्षमता की अनुभूतिजन्य सजगता, किन्तु परिस्थितियों के भीषण दबाव में बिखरते हुए सांसारिक व्यक्तित्व का द्वन्द्व अन्ततः बड़े कलाशिल्पी के विस्फोट को मद्धिम कर देता है। यदि दीपक में तेल हो, ऊँची बाती हो मगर दीये का आकार छोटा हो- तो लौ की लपट कितनी ऊँची उठेगी? जिस तरह एक बन्द कमरे में आह्वान कीजिए और उतनी ही ताकत से खुले मैदान में खड़े होकर पुकारिए- आवाज की पहुँच का कमाल साफ समझ में आ जाएगा। कबीर, तुलसी, रवीन्द्र जैसे प्रतिभा-शिखरों ने अपनी नैसर्गिक रचनात्मकता की मांग के अनुसार विधिवत् रगड़ा, गढ़ा, पीटा, तराशा खुद को। निश्चय ही सशक्त आत्मोत्थान, और व्यक्तित्व गठन के बगैर प्रतिभा की आग खुलकर दहक नहीं पाती। मुक्तिबोध के गद्य और काव्य में भावगत, भाषागत जितनी उलझनें और जटिलताएं हैं- व्यक्तित्व के इसी असंगठन के कारण ही। मुक्तिबोध विलक्षण चिंतक थे, बेलीक निष्कर्षों के दुस्साहसिक गोताखोर थे, प्रखर भावाकुलता के ज्वारभाटा थे- किन्तु परिस्थितियों, संघर्षों और दुश्वारियों से ऊपर उठकर जड़-चेतन जगत पर निरभ्र आसमान की तरह छा जाने वाले व्यक्तित्व न थे। इसे यूं कहें कि वे सांसारिकता के अन्तहीन झंझावतों के बीचोबीच खड़े रहकर टकराने वाले सिपाही हैं, हजारेां थपेड़ों की चोट सहकर परम चट्टान की तरह अविचल रहने वाले ध्यानी नहीं। विज्ञान की मानें तो मनुष्य अपने मस्तिष्क की कुल क्षमता का अधिकतम 15 प्रतिशत ही इस्तेमाल कर पाता है। ठीक यही सूत्र प्रकृति प्रदत्त रचनाशीलता, हृदय की क्षमता और व्यक्तित्व के गुणों के संदर्भ में भी लागू होता है। यह सामान्य सा दिखता शरीर दरअसल आश्चर्यजनक चमत्कारों का परमाणु रियेक्टर है। मनुष्य कोई भी चमत्कारिक उपलब्धि अर्जित नहीं करता, बल्कि उसकी चिंगारी पहले से ही मिट्टी में छिपे हीरे, सोने, चांदी की भांति भीतर मौजूद रहती है। व्यक्ति केवल उन क्षमताओं को संकल्प की सघनता के बूते निखारता है और उसे परिवर्तनकारी चमक देने का आजीवन प्रयत्न करता है। यह चमक अध्ययन, मंथन, अभ्यास, प्रतिबद्धता, ईमानदारी, साहसिक समर्पण और असीम उदारता से पैदा होती है। मनुष्य के ढांचे में कल्पनाशक्ति के सैकड़ों स्वर हैं, मनःशक्ति की हजारों जादुई दिशाएं हैं, कलात्मक भंगिमाओं के अनगिनत रूप हैं- मगर हैं ये दबे, छिपे, सुप्त और प्रशांत। बुद्ध ने कहा कि परम मुक्ति का द्वारा सबके भीतर है।मगर यह उपलब्धि हासिल ही कितनों को होती है? इस पृथ्वी पर, इस सृष्टि में, ब्रह्माण्ड में तीन शब्द सबसे निरर्थक हैं- निर्जीव, पराया और मृत्यु। निर्जीव कुछ भी नहीं न जड़, न पदार्थ, न वस्तुएं, न दृश्य, न प्रकृति। इसी तरह समूचे ब्रह्माण्ड में पराया कुछ भी नहीं न पत्ता, न कांटा, न झाड़ी, न रात, न दिन, न शत्रु, न आलोचक, न उत्तम, न अधम। फिर मृत्यु शब्द पर हंसी आती है। हर चीज बस बदल रही है, रूप, आकार, प्रकार, रंग, भूमिका इत्यादि में। पानी की मृत्यु हुई तो भाप बना, भाप की मौत हुई तो बादल और बादल मरा तो पानी हुआ। वैसे ही आग मरी तो राख, रोशनी और धुंआ हुई। इसी अनन्त चेतना का परम जागरण अपने कबीरत्व के लिए अनिवार्य है। कालजयी रचनाशीलता इसके सिवा और क्या है कि एक-एक में खुद को मिटा दो और खुद में एक-एक को समा लो। मुक्तिबोध निश्चय ही बहुगामी चेतना की चट्टान थे, वे सोच सकते थे- अदृश्य की सटीक हकीकत, पढ़ सकते थे, भावी मनुष्य के माथे पर लिखे अक्षर, वे कर सकते थे अपने वजूद का सर्वव्यापीकरण। यूं ही नहीं निकल गया उनकी कलम से- व्यक्तित्वांतरणशब्द। मुक्तिबोध की कठिनाई सिर्फ इतनी कि प्रकृति प्रदत्त प्रतिभा की मांग के अनुसार अपना शरीर न तराश पाए। कविता आलोचना यहां तक कि कहानियों में भी- उन्हें अपने लघुताबोध की पीड़ा व्याकुल कर देती थी। उल्लेखनीय यह भी कि उन्हें आभास था कि मनुष्य में नैसर्गिक क्षमता असीम है- बस सही दिशा में, वैज्ञानिक ढंग से उसे खोजने, निखारने और लहलह दमकाने की आवश्यकता है। यह बात और है कि वे खुद अपनी अनमोल विलक्षणता को उस परमत्व तक नहीं पहुंचा सके।
कवि के नितांत निजी शिल्प पर विचार करते हुए मुक्तिबोध ने लिखा है- अपने स्वयं के शिल्प का विकास केवल वही कवि कर सकता है, जिसके पास अपने निज का ऐसा मौलिक विशेष हो, जो यह चाहता हो कि उसकी अभिव्यक्ति उसी के मनस्तत्वों के आकार की, उन्हीं मनस्तत्वों के रंग की, उन्हीं के स्पर्श-गंध की हो।’ (नया ज्ञानोदय, अक्टूबर- 2016, पृ.7)
जाहिर है- मुक्तिबोध काव्य शिल्प के विलक्षणपन को लेकर बखूबी सचेत थे। उन्हें अनुकरण से चिढ़ थी, कहे को कहने से असंतोष था और लीक पीटना उन्हें कतई गंवारा न था। इस साहसिक मंशा का नवोन्मेषी नतीजा यह निकला कि उन्होंने अभिव्यक्ति के निहायत अपरिचित ट्रेंड को जन्म दे दिया, जो मुक्तिबोध की अपनी खोज है, जिसे कोई लाख चाहकर भी दुहरा नहीं सकता। मुक्तिबोध ने अपना शिल्प शिखराकार करने के लिए परम्परागत, आधुनिक, परिचित-अपरिचित, धर्मपरक, गैर धार्मिक, स्थूल और सूक्ष्म सब प्रकार के प्रतीकों का अफलातूनी प्रयोग किया। उनकी कविताओं की पंक्ति-दर-पंक्ति में नये से नये, अनोखे प्रतीक भरे पड़े हैं, जिन्हें किसी आश्चर्यजनक सभ्यता की अबूझ लिपि की तरह आज तक पूर्णतः समझा नहीं जा सका है। मुक्तिबोध अपनी शर्तों की झूम में नाचने वाले चेतनाशिल्पी थे। वे खुद की बनायी शर्तों पर, मनादण्डों और आकांक्षाओं पर एक सौ एक प्रतिशत खरा सिद्ध होने के लिए आत्म संकल्पित थे। ऐसी रहस्यमय जिद्द में उनके सामने न पाठक होता था, न बौद्धिक और न ही सृजन का पक्षधर। यही कारण है कि मुक्तिबोध के बिम्ब, प्रतीक और लाक्षणिक अर्थ आम पाठकों के लिए विकट चुनौती हैं। बिम्ब का जन्म सर्वप्रथम कवि के विद्युतमय कल्पनाकाश में होता है। अपने निहित उद्देश्य को उद्भासित करने वाला शब्द-पद जब तक सटीक मिल नहीं जाता, तब तक सर्जक अनुसंधान में तल्लीन रहता है। मुक्तिबोध ने परिचित प्रतीकों में नहीं, अपरिचित प्रतीकों में अप्रत्याशित बिम्बों का ताना-बाना खड़ा किया। एक प्रकार से उनकी कविताएं जादुई बिम्बों की कीमती पहेलियां हैं, अपने निगूढ़ अर्थों को लिए-दिए समुद्र में डूबी विशाल चट्टानें हैं। ऐसी जटिल बिम्बमय कविताओं का साइड इफेक्ट यह कि यदि वे रोमांच भरती हैं, आतंकित करती हैं तो विकर्षण भी पैदा कर देती हैं। जिन्हें कविता या साहित्य से ज्यादा कुछ लेना-देना नहीं है, वे रूचि के साथ मुक्तिबोध की तनाव भरने वाली कविताओं को कभी नहीं पढ़ेंगे। इतना ही नहीं उनकी भाषा-शिल्प और शैली से प्रेरणा लेकर यदि काव्य सृजन किया जाए तो हम आम पाठक तक न पहुँच पाएंगे, न ही उनका विस्तार कर पाएंगे। प्रतीक, संकेत और बिम्ब अर्थ के प्रभाव को सघन करते हैं। लक्षणा और व्यंजना शब्द-शक्तियों का लक्ष्य भी अर्थ के सौंदर्य को सघन और स्थायी बनाना है। दर्शनशास्त्र में विचार जहाँ सीधे-सीधे प्रकट होते हैं, वहीं साहित्य में प्रतीकों एवं बिम्बों के माध्यम से। इस तरह प्रतीक और बिम्ब मूलतः चिंतनसूत्र, विचार-सूत्र की भूमिका निभाते हैं। स्वयं मुक्तिबोध ने भी अनेकानेक प्रतीकों और बिम्बों की स्थापना अपने भीतर ज्वारित होते प्राणमय विचारों की अभिव्यक्ति के लिए की। परन्तु मुक्तिबोध ऐसे पहले कवि हैं, जिन्होंने अनुभूतियों की रहस्यपूर्ण ऊँचाइयों में उड़ते हुए लोकोत्तर बिम्बों और अलौकिक प्रतीकों का प्रयोग किया। संस्कृत-शिरोमणि कालिदास और हिन्दी कविगुरु तुलसीदास ने अत्यंत सटीकप्रसंगानुकूल और भावोाचित उपमानों, प्रतीकों और बिम्बों का नवनिर्माण किया। मनोमस्तिष्क के कोने-कोने में अपने दमखम का सिक्का जमा लेते हैं- इन कवियों के शब्दचित्र। किन्तु मुक्तिबोध द्वारा आविष्कृत प्रतीकों, बिम्बों में भारी जटिलता है। ज्यादा नहीं बस एक उदाहरण- इन नील सकण्टक पत्रों में है इत्र/ प्रेम का/ भव्य जिन्दगी का सत है/ कि तेल प्रदाहक है प्राण के नेम का/ पर कांटे हैं- विक्षुब्ध ज्ञान के तीव्र/ उद्विग्न वेदनापूर्ण क्षोभ की नोक/ वे चैन न लेने देंगे!! (भूरी-भूरी खाक धूल, पृ. 62)
असीम सच के प्रति हजारों दिशाओं में विस्फोटित होती मुक्तिबोध की बेजोड़ अनुभूति ने आधुनिक हिन्दी कविता के सबसे जटिल शिल्प को जन्म दे दिया। यह काव्यशिल्प तब भी चुनौती था, आज भी चुनौती बना खड़ा है और कल भी रहेगा। काव्य-गठन के स्तर पर यही मुक्तिबोध की ऐतिहासिक मौलिकता है और उनकी दुर्गनुमा दिखती भव्य दुर्बलता का कारण भी।

- भरत प्रसाद 
एसोसिएट प्रोफेसर
हिन्दी विभाग
पूर्वोत्तर पर्वतीय विश्वविद्यालय
शिलांग - 22 (मेघालय)
मो. नं. 9863076138


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