5 मार्च 1944 को मथुरा में जन्मी डॉ. शशि गोयल हिंदी साहित्य जगत की प्रतिष्ठित एवं बहुआयामी रचनाकार हैं। बचपन से ही पठन-पाठन में गहरी रुचि रही और अल्पायु में ही लेखनी ने आकार लेना शुरू कर दिया। शिक्षा के क्षेत्र में उन्होंने एम.ए. (अंग्रेज़ी), एम.ए. (हिंदी) तथा हिंदी में पी-एच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त कीं।
कहानी, कविता, लेख, व्यंग्य, यात्रा-वृत्तांत तथा विशेष रूप से बाल साहित्य में आपका उल्लेखनीय योगदान रहा है। अब तक आपकी 55 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। बाल कथाएँ, बाल गीत, बाल उपन्यास, कथा-संग्रह, काव्य-संग्रह, व्यंग्य-संग्रह, संस्मरण और शोधपरक कृतियों के माध्यम से आपने साहित्य की विविध विधाओं को समृद्ध किया है। आपकी चर्चित कृतियों में बादल की सैर, सोने का पेड़, श्रेष्ठ बाल कहानियाँ, भूतवाले पंडित जी, बदल गया मन, सूरज को भी लगती सर्दी, गोलू-भोलू और जंगल का रहस्य, मैं अकेली, नेह बंध की देहरी, मॉरीशस यात्रा, कैलाश मानसरोवर, इंसान कहीं के, धूप प्यारी बच्ची सी, छिटके हुए लोग आदि विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
साहित्यिक योगदान के लिए आपको देश की अनेक प्रतिष्ठित संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया गया है। जवाहरलाल नेहरू बाल साहित्य अकादमी द्वारा साहित्य मनीषी सम्मान, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा साहित्य भूषण एवं सुभद्रा कुमारी चौहान महिला बाल साहित्य सम्मान, तथा मैं अकेली को पुरस्कृत किया जाना उनकी उपलब्धियों में प्रमुख है। इसके अतिरिक्त अनेक राष्ट्रीय साहित्यिक संस्थाओं ने समय-समय पर उन्हें सम्मानित किया है।
डॉ. शशि गोयल की रचनाएँ संवेदनशीलता, सहज भाषा, मानवीय मूल्यों और बाल मन की सरलता को अभिव्यक्त करती हैं। वे निरंतर लेखनरत रहकर हिंदी साहित्य की सेवा कर रही हैं।
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