इसमें कोई संदेह नहीं कि वर्तमान साहित्य, खासकर हिन्दी साहित्य जगत में बड़ी हद तक एक विचारधारा के प्रति झुकाव, लेखकों की खेमेबाजी, अनावश्यक विमर्शप्रियता एवं स्त्री यौन स्वातंत्र्य का परचम सायास लहराने की प्रवृत्ति परिलक्षित होती है। दलित विमर्श और स्त्री विमर्श के जुनून में भी कई प्रतिष्ठित लेखकों यथा प्रेमचंद, सुभद्रा कुमारी चौहान, शिवानी, अमृतलाल नागर, शैलेश मटियानी को न केवल खेमेबाज़ लेखकों से कमतर आँकने बल्कि कई बार अपमानित तक करने का प्रयास किया जाता रहा है। इतना ही नहीं, वर्तमान में महिलाओं सहित साहित्यकारों का एक बड़ा वर्ग यथार्थ लेखन के नाम पर देह विमर्श की आड़ लेकर यौन क्रियाओं एवं यौन विकृतियों का यथारूप चित्रण करने की हिमायत करने में कमर कस के उठ खड़ा हुआ है। स्वाभाविक है कि बदलते लेखकीय सरोकारों और प्रतिबद्धताओं के नाम पर जो लिखा जा रहा है, वह कई बार स्थापित नैतिकता, परंपरागत जीवन मूल्यों और परिष्कृत पाठकीय अभिरुचि के विपरीत होता है।
ऐसे परिवेश में वरिष्ठ कथाकार, व्यंगकार तथा समालोचक श्री राजेन्द्र सिंह गहलौत, बतौर एक जागरूक पाठक, उपरोक्त प्रवृत्तियों के खिलाफ अपनी असहमति के स्वर लगातार उठाते रहे हैं। पाठकीय अभिरुचि, पठनीयता के संकट, साहित्य में यथार्थवाद, यौन स्वातंत्र्य, देह-विमर्श, भाषा और भाषाई शुद्धता जैसे विषयों पर उनके गंभीर-विचारोत्तेजक आलेख विभिन्न साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में लगातार आते रहे हैं। ऐसे ही 23 आलेखों का संग्रह ‘असहमति के स्वर’ लोकोदय प्रकाशन, लखनऊ से प्रकाशित हुआ है। यह आलेख संग्रह उनके पूर्व प्रकाशित दो आलेख संग्रहों ‘इस हमाम में’ तथा ‘पाठकीय अभिरुचि और साहित्य’ ही की तरह शोधपरक, विश्लेषणात्मक एवं विषय वैविध्य समृद्ध है।
श्री गहलौत हिन्दी साहित्य के पाठकों की उस क्लासिक श्रेणी के मुखर प्रतिनिधि हैं, जो साहित्य के नाम पर परोसे जा रहे अश्लील, अरुचिकर, भदेस और कई बार भामक तथ्यों की खुलकर आलोचना करते हैं, उन्हें ख़ारिज करते हैं। प्रस्तुत संग्रह के एक आलेख ‘सिर्फ और सिर्फ साहित्यकार चाहिए’ में वे इस बात को मुखरता के साथ रेखांकित करते हैं कि विभिन्न विमर्शों के रंग में रंगे रचनाकर, विशेष विचारधारा के प्रचार-प्रसार का संकल्प लिए मिशनरी साहित्यकार एवं साहित्यिक पत्रिकाएँ तो यत्र तत्र सर्वत्र दिखलाई पड़ रहे हैं लेकिन सिर्फ साहित्यकार एवं साहित्यिक पत्रिकाएँ साहित्य जगत के परिदृश्य से विलुप्त होती जा रही हैं। वे इसी आलेख में कहते हैं, ‘नई-नई विचारधाराओं के इश्तहार वर्तमान साहित्य के नाम पर बांटे जा रहे हैं और इन प्रयासों में बंटते जा रहे हैं साहित्यकार, रचनाकर।’
श्री गहलौत उपरोक्त संग्रह में शामिल कई आलेखों के माध्यम से इस प्रश्न को शिद्दत से उठाते हैं कि क्या देहविमर्श यौन सम्बंध विमर्श का पर्यायवाची हो सकता है और क्या यौनक्रियाओं के यथारूप चित्रण के बिना लेखकीय संप्रेषणीयता या पाठकों के बीच उस लेखन की स्वीकार्यता बाधित होती है? वे इस तथ्य को भी बार-बार रेखांकित करते हैं कि साहित्य में देहविमर्श के नाम पर जो कुछ चल रहा है, वह स्त्री यौन शोषण या यौन विकृति पर संजीदगी से बात करने के बजाय फ्री सेक्स के नाम पर बनाए गए स्वछंद यौन सम्बन्धों की वकालत करता है। ऐसी वकालत भी खासकर महिलाओं द्वारा किए गए स्वच्छंद यौनाचार की अधिक होती है। प्रस्तुत संग्रह के कई आलेख यथा ‘स्त्री यौन स्वातंत्र्य समर्थक लेखन क्या स्त्री हितों के अनुकूल है?’, ‘बुद्धिजीवियों द्वारा अनैतिकता एवं अप्राकृतिक सम्बन्धों की हिमायत क्यों?’, ‘क्या यौन विकृतियों को स्वीकारा एवं स्थापित किया जा रहा है?’ तथा ‘देहवादी साहित्यकार क्या बदतर नहीं होते?’ इसकी बानगी हैं।
लेखक अपने आलेखों ‘वर्तमान साहित्य में यथार्थवादी लेखन क्या सिर्फ अँधियारा ताकता है?’ एवं ‘यथार्थवाद, संवेदनशून्य दृष्टि और शिल्प का चमत्कार’ में इस तथ्य को भी रेखांकित करते हैं कि यथार्थवादी लेखन महज यथार्थ का रिपोर्ताज़ नहीं है और न ही किसी समाचार पत्र की सनसनीखेज खबर है। वह यथार्थ से उठाए गए कथ्य की ऐसी प्रस्तुति है जिसमें समाज एवं मानव हित की भावना निहित हो।
वस्तुत: यथार्थवाद के नाम पर इसके विपरीत हो रहा है। बक़ौल लेखक वर्तमान साहित्य में व्याप्त अंधकारमय यथार्थवादी साहित्य में जहाँ आशा, विश्वास, उल्लास, जिजीविषा, संघर्ष का प्रकाश दबकर रह गया है, वहीं परिवेश-अन्वेषी यथार्थवादी लेखन ने मानव जीवन को, मन की भाषा को बाँचना छोड़ दिया है। लेखक यह भी मानते हैं कि यथार्थवादी रचनाकर कथ्य के प्रस्तुतीकरण में शिल्प चातुर्य दिखलाता है, भाषा के कौशल से उसे संवारता है तब कहीं जाकर वह प्रभावशाली रचना रच पता है। इस रचना प्रक्रिया में रचनाकार को इतनी फुर्सत कहाँ कि वह घटना, पात्र एवं स्थितियों को जी सके। उसके पास इतना धैर्य कहाँ कि वह उस घटना एवं पात्र में अपने आपको रखकर उनकी वेदना से संवेदित हो सके।
वर्तमान साहित्य और उसके साहित्यकार जहाँ पाठकों के न होने का रोना रो रहे हैं, सदियों पहले लिखी गई अलिफ लैला, सिंहासन बत्तीसी जैसी रचनाएँ आज भी पाठकों के बीच लोकप्रिय हैं। इसी बात को रेखांकित करते हुये आलेख ‘वर्तमान साहित्य की पठनीयता का संकट : दोषी कौन?’ में लेखक कहते हैं कि आधुनिक कहानी विभिन्न आंदोलनों, प्रयोगवादों, विमर्शों और विचारधाराओं का शिकार हो गई, जिससे उसकी पठनीयता कम होती गई। पठनीयता कम होने का एक अन्य कारण है आधुनिक लेखन आम पाठकों हेतु बोधगम्य, रोचक एवं पठनीय नहीं रह गया है। लेखक का मानना है कि रचनाकारों को वाद, विशेष विचारधारा और विमर्श इन सबके बंधनों से बाहर निकलकर लेखन को पाठकों कि अभिरुचि के अनुरूप ढालना होगा।
कई लेखकों को लगता है कि लोक व्यवहार और सामाजिक मर्यादाओं का अतिक्रमण करके ही यथार्थ रचा जा सकता है। उनकी सफलता लक्ष्मण रेखाओं को लांघने में ही निहित होती है। पर क्या सचमुच ऐसा है? संग्रह के आलेख ‘वर्तमान साहित्य में यथार्थवाद क्या एक भामक अवधारणा है?’ में साहित्य में रचे जा रहे आदर्शोन्मुखी यथार्थ से लेकर समाजवादी यथार्थ तक और अब जादुई यथार्थ की अवधारणा के प्रस्तुतीकरण की पड़ताल की गई है। रचनाओं में प्रस्तुत इस जादुई यथार्थ का शिकार हो रहा आम पाठक सुरुचि सम्पन्न तथा चैतन्य होने के बावजूद निरुपाय होता है। वह परोसे गए लेखन की सामग्री देखकर सकुचाता है और फिर उस सामग्री व उसे परोसने वाले लेखक की उपेक्षा करता है। अति हो जाने पर वह ऐसे लेखकों को चुपचाप अस्वीकृत भी करता है, इसमें दो राय नहीं।
संग्रह के कुछ अन्य आलेख यथा ‘हिन्दी भाषा की देवनागरी लिपि की उपेक्षा क्यों?’, ‘लोकभाषा की अस्मिता का प्रश्न’, ‘क्या पुरस्कारों का कोई सम्मान नहीं होता?’, ‘नास्तिक साहित्यकारों द्वारा हिन्दू धर्म, देवी-देवता एवं वेदग्रन्थों का मज़ाक उड़ाना क्या प्रगतिशीलता है?’ और ‘थर्ड जेंडर या ट्रांसजेंडर नहीं सिर्फ यौन विकलांग’ अपने आपमें बेहद महत्वपूर्ण हैं तथा गंभीर विमर्श की मांग करते हैं।
आलेख संग्रह – असहमति के स्वर
लेखक – श्री राजेन्द्र सिंह गहलौत
प्रकाशक – लोकोदय प्रकाशन, लखनऊ
कुल पृष्ठ – 200
मूल्य - रु 350/-