मैं पेशे से डॉक्टर हूँ और यही चाहती थी कि तन मन से सिर्फ मरीजों की ही सेवा करूँ। पर मेरे मन की बांसिया, बेसुरी ही सही, बजती रही। जो भी भाव मन में उठे मैं उन्हें पन्नों पर उतारती रही। मालूम नहीं ये कविता है, नज़्म है या गीत है। बस मन के उद्गार हैं। सायास कुछ भी नहीं लिखा। कभी पूर्ण सूर्यग्रहण को देखकर चाँद से जलन हुई कि उसके आगोश में सूरज क्यों है और कभी पूनम का पूरा चाँद देखकर ख्वाहिश हुई कि काश वो आधा मेरी गोद में आ जाता।
लिखते
वक्त शब्दों को चुराया नहीं कभी पर मेरी लेखनी ग़ालिब और गुलज़ार से बहुत प्रभावित
रही। जो भी लिखा, कई लोग इसे स्वान्तः
सुखाए भी कहते हैं। दरअसल मैंने मरीजों की सेवा भी तो अपने सुख के लिए की और इसका
प्रतिफल ये रहा कि मरीजों को स्वास्थ्य लाभ के साथ-साथ खुशी भी दी। अपनी कविताओं
के लिए भी यही कह सकती हूँ। आज जिस संताप में हर कोई जल रहा है उनके लिए शीतल लेप
की तरह होंगी मेरी नज़्में। मुझे यकीन है कि आप सबको जरूर पसन्द आएँगी।
आखिरी
में अपने इस सफर में अपने जीवन साथी अरुण को याद करना नहीं भूल सकती। उसके बिना
कुछ भी सम्भव नहीं था। दरअसल हम दोनों के नाम एक ही कविता है, वो अरुण और मैं उसकी पहली किरण।
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उषा
अरुण