Showing posts with label किताब चर्चा. Show all posts
Showing posts with label किताब चर्चा. Show all posts

Sunday, 21 December 2025

आँख भर आकाश

 

“आज जीवन कठिन से कठिनतर होता जा रहा हैजीते रहने के लिए लगातार संघर्षरत रहना मजबूरी हैपूँजीवादी श्रम-विभाजन के इस माहौल में जीवन से रागात्मकता और काव्यबोध लुप्त होते जा रहे हैं, जीवन में कविता का स्पेस सिकुड़ता चला जा रहा है। ऐसे में आधुनिक जीवन की जटिलता को कविता के वितान में बाँधना आज की आवश्यकता है।“

 

https://www.amazon.in/gp/product/9387149528/

Tuesday, 9 December 2025

कवि, कविता और मेरी बात

अगर जन्म लिया है तो चुनौतियाँ आनी ही हैं और उनसे निबटना भी लाजमी है। पर किसी ऐसे व्यक्ति के सम्बन्ध में कुछ लिखना और वह भी शब्द-विस्तार की सीमा-रेखा में, जिसे आप लगभग अद्योपाँत जानते हों, भी एक बड़ी चुनौती है; क्योंकि ज़्यादा जानकारी होने पर विचार गड्ड-मड्ड होने लगते हैं और लेखन सौष्ठव बिगड़ता है, पर वह चुनौती मुझे दी गई है जो स्वयम् न कवि है न लेखक अर्थात् सौंपे गए कार्य को अंजाम देने हेतु आवश्यक और पर्याप्त उपकरणों के अभाव में लगभग अक्षम। पर कोशिश तो की ही जानी चाहिए सो कोशिश कर रहा हूँ।

इस काव्य खण्ड के रचयिता श्री ब्रह्मानन्द दुबे जैविक रूप से मेरे पूज्य चाचा थे अर्थात् मेरे पूज्य पिताजी के छोटे भाई। जब वह हाई स्कूल की परीक्षा दे रहे थे उसी दौरान उनके पूज्य पिताजी अर्थात् मेरे पूज्य बाबा की अचानक मृत्यु हो गई। किसी तरह उनको परीक्षा देने हेतु भेजा गया। ज़ाहिर है ऐसे माहौल में परीक्षा किस मनो-स्थिति में दी होगी, पर फिर भी शेष पर्चे भी लिखे और उत्तीर्ण भी हुए, द्वितीय श्रेणी में- जो उस ज़माने के हिसाब से सम्मानपूर्ण था क्योंकि उस ज़माने में (चालीस के दशक में) प्रथम श्रेणी बँटती नहीं थी और कला क्षेत्र में तो बहुत ही प्रतिभाशाली की आती थी। यह उनकी अदम्य संकल्प शक्ति का पहिला प्रमाण था जो जीवन के आख़िरी पल तक उनके साथ रही, उन्हें ज़िद्दीका विशेषण दिलाने की सीमा तक और उसके बाद उन्होंने आगे पढ़ने से मना कर दिया और बावजूद मेरे पूज्य पिताजी, जो अब उनके लिए पिता तुल्य थे तथा अपनी परम पूज्या माँ के पूरा ज़ोर देकर समझाने पर भी नहीं माने। कालान्तर में उन्होंने पहिले उत्तर प्रदेश खाद्य विभाग और फिर रेलवे में सेवा की जहाँ से वे सेवानिवृत हुए।

सेवा प्रारम्भ करने के बाद अवसर आया विवाह का, जिसके लिए उन्होंने जो की तो उसे हाँ में कोई तब्दील न करा सका; वह पूज्य माँ भी, जिनके लिए उनके भाव थे: भोली भाली सरलता की त्यागमयी सौम्या मूर्ति जिनमें मुझे देवी माँ के साक्षात दर्शन होते थे...।“

देश भक्ति, सामाजिक चेतना, कलाओं के प्रति स्वभाविक रुझान के साथ स्वयम्-प्रगल्ब्ध्ता से बचने के पारम्परिक संस्कार पूरे परिवार में थे जिसकी एक बानगी उन्हीं के शब्दों में: मेरे ताऊजी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे- 15 अगस्त को देश स्वाधीन हुआ- इस अवसर पर ताऊजी ने मुझसे भारत माँ का भित्ति चित्र बनवाया, उसकी पूजा-आरती करके प्रसाद वितरण करते हुए ख़ुशी के साथ बोले- आज मेरा मनोरथ पूर्ण हुआ, भारत माता की जय।

स्पष्ट है देश के लिए त्याग किया गया था, पर कोई आडम्बर नहीं और बालक ब्रह्मानन्द में भित्ति चित्र बनाने की क्षमता थी। दिखावे से दूर रहने की प्रवृति ने नुक़सान बहुत किया और उनका चित्रित किया हुआ केवल एक चित्र धूल-धूसरित अवस्था में मुझे हस्तगत हो पाया। अपने बाल साथियों के साथ पहिले बाल विनोद पुस्तकालयकी स्थापना की और एक क्लब भी बनाया गया जिसका एक अभूतपूर्व नाम रखा गया: गोबर क्लब। गोबर क्लब के उद्देश्य, संस्थापकों के ही शब्दों में:-

गौरव ओज बालकों में

भरने को राष्ट्र प्रेम का भाव,

गोबर क्लब साकार हुआ है,

लेकर अपना एक स्वभाव।“

और फिर थोड़ा वय प्राप्त करने पर द वीणापाणि म्यूज़िक अकादमीकी स्थापना, जिसके माध्यम से कन्नौज नगरी में स्तरीय संगीत सम्मेलन आयोजित हुए, के बाद जब वे दिल्ली आए तो उनकी सांस्कृतिक, कलात्मक अभिरुचियों को विस्तार मिला जिसका सबसे बड़ा कारण और सहयोग रहा उनके अग्रज श्री कृष्णानन्द दुबे और उनकी संस्था, इण्डियन सेण्टर फ़ार कल्चरल इंटिग्रेशनका। पर अभी तक उनके कवि स्वरूप का प्रादुर्भाव नहीं हुआ था। लिखते थे: पर कविता नहीं, संस्मरण या हितोपदेश प्रकार के लेख जो स्वयम् में अनन्य प्रकार की अनुभूतियाँ समेटे हैं और शैली तथा दृष्टिकोण में अनूठी हैं (उनका प्रकाशन भी करने की योजना है)। पर मुझे याद पड़ता है कि धीरे-धीरे उनकी अन्य गतिविधियाँ धीमी पड़ती गयीं और कागज़ क़लम के प्रति उनका रुझान बढ़ता गया और इसी मध्य कविता ने जन्म लिया जो बढ़ते-बढ़ते आज चौदह जिल्दों में है जिसके कलेवर का अन्दाज़ इस तथ्य से लगा सकते हैं कि प्रस्तुत कविताएँ मात्र एक जिल्द की आधी हैं। उन्होंने लिखा और ख़ूब लिखा, सभी विषयों पर लिखा। न विषय पारम्परिक, न भाषा, न शैली साँचाबद्ध, पर समझने के लिए बहुत कुछ है और इसका जो विश्लेषण उनके परम प्रिय मित्र श्री हरिहर नाथ भट्टाचार्य ने किया उससे सही और बेहतर आँकलन उनके कृतित्व का नहीं हो सकता। श्री भट्टाचार्य जी ने लिखा था: श्रद्धेय ब्रह्मानन्द!

बर्षों के अध्ययन एवम् तर्क अनुभव से मैं जहाँ जिस बिन्दु पर पहुँचता हूँ- आपके निर्मल हृदय में वह ग्राह्य सत्य वर्षों पूर्व अनायास ही प्रतिबिम्बित हो चुका होता है।

उन्होंने स्वयं भी लिखा है:-

मात्राओं का नहीं हूँ ज्ञाता प्रबोधा,

पर भावनाओं को हूँ संजोता।

पर उनकी सर्जनात्मकता आगे चलकर कविता पर ही क्यों केन्द्रित हो गई? इसका उत्तर सीधे तो नहीं मिला पर मैं लगभग सही अनुमान लगा सकता हूँ।

प्रारम्भ में तो कारण रहा होगा, जैसा उन्होंने लिखा- साहित्यिकी लेखन क्रिया एक ऐसी ज्ञान-यज्ञ विधा है जिसमें विविध सामग्रियों की आवश्यकता नहीं पड़ती। मात्र विनायकी- लेखनी, पत्र पृष्ठ व मातु सरस्वती उद्भूत उद्गारों की कृपा वांछित।

ध्यान दीजिए: सिर्फ़ लेखनी नहीं विनायकीलेखनी और जितना वह लिख गए उससे यही लगता है कि ऊनकी लेखनी पर गणेश कृपा ही थी जो इस गति से लिख पाए। ऐसे सैकड़ों प्रयोग उनकी शब्दावली में हैं। उस दिन प्रूफ़ रीडिंग करते समय आटे रोटी के लिए एक शब्द आया मधुकर’, अजीत और मैं दोनों चक्कर में पड़ गए: यहाँ मधुकर कैसे? याद आया साधु जब भिक्षा माँगते हैं तो उसे मधुकरीभी कहते हैं। तब समझ में आया कि आटा रोटी के लिए मधुकर कहाँ से आया। ऐसे कई प्रयोग उनके लेखन में हैं।  

परन्तु उनके कविता लेखन में समय के साथ एक कारण और जुड़ गया। ज़िद्दी तो वे थे ही यानी लिए गए निर्णय पर पुनर्विचार करने का कोई कारण उनकी समझ में आना लगभग असम्भव, उस पर तुर्रा यह कि स्पष्ट भाषी; यानी करेला और  नीम चढ़ा। फलस्वरूप उनके साथ उसी की निभ पाती थी जो या तो उन्हें समझे या स्नेह करे। तीसरा कारण, जो सामान्यतया होता है अर्थात् स्वार्थ सिद्धि, सो  स्वार्थी लोग उनको फूँटी आँख न भाते थे इसलिए मतलबी लोगों की दाल गल नहीं सकती थी। उन्होंने लिखा, जो स्वाभिमानी होगा, वह ईमानदार होगा, स्पष्टवादी होगा और संतोषी होगा। वो चाटुकारिता में विश्वास नहीं रखता।

ऐसे में परिचितों का दायरा संकीर्ण होते जाना स्वाभाविक था। दूसरे अपनी जन्म नगरी से अत्यधिक प्रेम होने के कारण उन्होंने दिल्ली में कोई ठिकाना नहीं बनाया और यही विचार रखा कि सेवानिवृत्ति पश्चात अपनी जन्म नगरी में ही रहेंगे। फलतः 65 वर्ष की आयु में वे दिल्ली छोड़कर कन्नौज आ गए- ऐसा निर्णय जिसको उन्होंने, आदत मुताबिक़, निभाया तो पर जो उन्हें आमरण टीस पहुँचाता रहा। ज़ाहिर है: जो कन्नौज वह छोड़कर गए थे वह अब नहीं रहा था, रहता भी नहीं और वह स्वयम् भी 45 साल से अधिक का समय महानगरीय संस्कृति में गुजारने के बाद कस्बायी संस्कृति के अभ्यस्त नहीं रहे थे। ऐसा नहीं कि वह इस नज़ाकत को समझते नहीं थे पर वह इसके साथ समझौता नहीं कर पाए क्योंकि समझौता करना उनके स्वभाव का अंग नहीं था। उनके संगी-साथी अब थे नहीं और अपने विचारों और सबसे बड़ी बात, अपनी उम्र के कारण जिस शिष्टाचार और सम्मान की अपेक्षा वह करते थे उसके लिए कन्नौज वासियों के पास समय नहीं था और समय इसलिए नहीं था क्योंकि स्वार्थ सिद्धि नहीं होनी थी। जहाँ भाव यह हों:

जिनमें नैतिकता होती

उनमें मानवता होती

आध्यात्मिकता उनमें प्रकटती

राष्ट्रीयता भी पनपती

वहाँ स्वार्थ का स्थान कहाँ ?

आगे बढ़ने से पहले यह स्पष्ट करना समीचीन होगा और यदि यह स्पष्टीकरण न दिया जाए तो उनके कृतित्व के साथ अन्याय होगा कि उनका लेखन अकेलेपन की उपज नहीं है और न ही वह किसी के प्रति आक्रोश या अपनी पीड़ा का उदबोधक है। आक्रोश है तो नैतिक मूल्यों के ह्रास पर और पीड़ा है तो सामाजिक कृतघ्नताओं के प्रति, इसमें व्यक्तिगत कुछ भी नहीं है। सही तो यह है कि अकेलेपन को उन्होंने सकारात्मक उपादान के रूप में इस्तेमाल कर लिया क्योंकि इसी से उनकी लेखनी विनायकी लेखनीबन पाई।

नैतिकता उनके लिए व अधिकतर परिवारीजनों के लिए, केवल आडंबर नहीं था। उन्होंने ब्रह्मचर्य व्रत लिया तो उसको पूरी निष्ठा के साथ निभाया और यह मैं पूरी सत्यता के साथ कह सकता हूँ इसलिए नहीं कि मैं उनका भातृज हूँ। भगवद भजन, संगीत और लेखन के अतिरिक्त उनके केवल एक ही व्यसन था: भोजन। परिणामस्वरूप पेट की छोटी-मोटी समस्याओं के अतिरिक्त वह स्वस्थ ही रहे। हाँ वह आजीवन एक किडनी पर ही गुज़ारा करते रहे क्योंकि उनकी एक किडनी जन्म से ही सूखी हुई थी और यदि उनको कभी अस्पताल ले जाना पड़ता था तो इसी कारण। पर वहाँ से भी डायलिसिस का अवलंबन लिए बिना वह लौट आते थे।

धीरे-धीरे कविता ही उनकी संगिनी बन गई। वे एक वाक्य अक्सर कहने लगे थे: चमत्कार को नमस्कार है। मैं प्रारम्भ से उनसे यह कहता रहा कि अपनी कविताओं को प्रकाशित करवाइए या मुझे अनुमति दीजिए और वह यही उत्तर देते मैं ज़रा और सुधार लूँ और सुधारने के साथ एक और कविता आ जाती। जब वह अन्तिम बार अस्पताल गए और उनको भान हो गया कि अब वह इस शरीर में अस्पताल से बाहर न आ पाएँगे तो वह बोले, जो मेरे लिए आदेश नहीं था, पर मैंने सुना, मैं जीना चाहता हूँ क्योंकि मैं अपनी कविताओं के माध्यम से समाज को कुछ देना चाहता हूँ। उन्होंने लिखा भी था:

नैतिकीय सामाजिक क्रान्ति भाव है

मन में,

क्षमतानुसार प्रकट होती वह लेखन में।

-    देवेन्द्र नाथ दुबे


Sunday, 7 December 2025

कविता पर मुकदमा

03 मार्च 2020,

 

कविता पर मुकदमासंग्रह पढ़ा। बहुत अच्छा लगा। कविताएँ सहज लगीं। बहुत गम्भीर बात को सरलता से कहने का साहस इन कविताओं में दिखाई देता है। इस विचारशून्य समय में आपकी कविताओं में विचार के साथ तंज भी है जो कविताओं को पठनीय बनाता है। इन कविताओं में हमारा समय विदग्ध रूप से हमारे सामने आता है।

कविता का सबसे जरूरी काम यह है कि वह अपने वक्त के रूबरू हो। जो कुछ हमारे समाज में घटित हो रहा है उसे कवि किस रूप में अभिव्यक्त करता है, यह चुनौती भी हमारे सामने है। अच्छा यह है कि कविताएँ सरलीकरण से बची हुई हैं। कोई घटना कविता कैसे बनती है, इसका प्रमाण कविताएँ स्वयं देती हैं।

हमारे समय में बुद्धिजीवियों की भूमिका कम सदिग्ध नहीं है। इस ढोंग को कविताएँ उजागर करती हैं।

दामोदर - बंगाल का अभिशाप, सुनो विद्याधर, मैं किस बात पर हँसूँ, कोरे कागज पर हस्ताक्षर, मेरे समय में बुद्धिजीवी, एक लड़की दुनिया की अदालत में, विषाक्त दीमकों का कुनबा इस संग्रह की श्रेष्ठ कविताएँ हैं।

कविता पर मुकदमा सीरीज की सभी कविताएँ बेहद धारदार और बोल्ड हैं। इन कविताओं में समकालीनता की बदरंग ध्वनियाँ हैं। इन कविताओं को पढ़ते हुए सहज ही भाषा पर ध्यान जाता है। आपकी भाषा सधी हुई और चुस्त है। कविता में शब्द फालतू नहीं लगते बल्कि उनका सावधानी के साथ उपयोग किया गया है।

कुल मिलाकर यह संग्रह मुझे अच्छा लगा।

शुभकामनाएँ।

 स्वप्निल श्रीवास्तव

Tuesday, 4 November 2025

प्रतिपक्ष का पक्ष – लोकधर्मिता के नए प्रतिमान

 -    प्रेम नंदन

आलोचना महज प्रशंसा या कमियाँ तलाशने का उपक्रम नही है; बल्कि किसी भी रचना या रचनाकार को समग्रता से समझने का एक साहित्यिक उपादान है आज जब आलोचना अपनी विश्वसनीयता खोती जा रही है और मात्र ठकुरसुहाती में तब्दील होती जा रही है, ऐसे में आलोचना के क्षेत्र में भी तोड़फोड़ की जरूरत लम्बे समय से महसूस की जा रही थी, ठीक इसी समय आलोचना के क्षेत्र में उमाशंकर परमार जैसे तेजतर्रार, बेबाक और तार्किक ढंग से अपनी बात कहने वाले यंग्री यंगमैन आलोचक के रूप में उभरना आलोचना के क्षेत्र में एक सुखद घटना है आलोचना के समकालीन परिदृश्य में अपनी टिप्पणियों और लेखों से हलचल मचाने वाले युवा आलोचक उमाशंकर परमार के लेखों का संग्रह है– प्रतिपक्ष का  पक्ष, जिसमें समय–समय पर लिखे गए और विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित होकर पर्याप्त चर्चा बटोर चुके उनके इक्कीस लेख शामिल हैं इन आलेखों में नवउदारवाद के आर्थिक, सामजिक व उत्तरआधुनिक, रूपवादी विमर्शों के बरक्स लोकधर्मी चेतना का वैचारिक पक्ष लेकर बहुसंख्यक जनता की जीवन समग्रता का खाका खींचने वाले लेखकों और पुस्तकों पर लिखे गए हैं

समकालीन कविता का सबसे बड़ा सच भूमंडलीकरण के परिप्रेक्ष्य में व्यवस्था का प्रतिरोध है, यह प्रतिरोध लोकधर्मी चेतना का युगसत्य है ‘प्रतिपक्ष का पक्ष’ में शामिल सभी लेख इसी व्यवस्था के प्रतिपक्ष की चर्चा करते हैं और आम आदमी के जीवन स्थितियों को चित्रित करती रचनाओं को और रचनाकारों, जिनमें समकालीन कविता के युवा और वरिष्ठ कवियों की चर्चा की गई है समय के साथ साहित्य की चिन्तन धारा भी बदलती है। कविता की रचना प्रक्रिया और शिल्प में परिवर्तन होते हैं तो आलोचना भी इन परिवर्तनों के आलोक में अपने मूल्य तय करती है। 1991 का वर्ष भारतीय इतिहास में बड़े  आर्थिक  परिवर्तन का वर्ष है। आर्थिक उदारीकरण लागू हुआ सार्वजनिक क्षेत्र में विनिवेश की प्रक्रिया तीव्र की गयी। इस नयी आर्थिक नीति का प्रभाव भारतीय आम जनता पर नकारात्मक रहा। जंगल और पहाड़ों के साथ भारतीय गाँव भी इसकी चपेट में आए। बढ़ते बाजारवाद के खिलाफ कविता और कहानी में प्रतिरोध की आवाज बुलन्द हुई। 2010 के बाद तो रचनाधर्मिता का आशय ही प्रतिरोध से लिया गया। जब रचना की मुख्यधारा प्रतिरोध है तो स्वाभाविक है आलोचना भी इस प्रतिरोध को रेखांकित करेगी क्योंकि आलोचना रचना से भिन्न नहीं होती है रचना और आलोचना एक दूसरे से जुडी हैं, एक-दूसरे की पूरक हैं। युवा आलोचक उमाशंकर सिंह परमार की किताब ‘प्रतिपक्ष का पक्ष’ साहित्य में प्रतिरोध की लोकधर्मी चेतना की पहचान कराने वाली बेहतरीन पुस्तक है। इस पुस्तक का आलोचकीय ताना-बाना प्रतिरोध और लोक को लेकर बुना गया है जिसके तहत परमार ने 2010 के बाद प्रकाशित कविता संग्रहों और कहानी संग्रहों को विशेष स्थान दिया है। इन किताबों की समीक्षा और सौन्दर्य उदघाटन में परमार भारतीय काव्यशास्त्र के सिद्धांतों को अपनी जरूरत के हिसाब से परिभाषित करते हुए रूपवादी समीक्षा व कलावाद के विरुद्ध अस्मिताओं के सवाल व हाशिए के सवालों को बड़ी शिद्दत के साथ समाहित किया है। इस पुस्तक में आज की कविता व नवनिर्मित आलोचकीय प्रतिमानों को पहचाना जा सकता है। समय के साथ आलोचना कैसे अपने औजार तय करती है, परखा जा सकता है। युवा आलोचक परमार नयी भाषा के साथ पुरानी आलोचकीय शब्दावलियों में तोड़-फोड़ करते हुए अपने अनुरूप शब्दावलियों का निर्माण किया है। साथ ही लोक और लोकधर्मिता को नए ढंग से परिभाषित करते हुए भाषा और साहित्य के विकास में लोक की भूमिका का नए सिरे से रेखांकन किया है। लोक की गतिशील संकल्पना प्रस्तुत करते हुए परम्परागत जड़ मान्यताओं व लोक सम्बन्धी फैले भ्रमों का तर्क के साथ निराकरण किया है। हालाँकि पुस्तक में सम्मिलित आलेख पूर्व प्रकाशित हैं मगर वह सारे आलेख विभिन्न समय में विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित होकर पर्याप्त चर्चा भी पा चुके हैं लेकिन ‘प्रतिपक्ष का पक्ष’ में इस क्रम से उन आलोखों को लगाया गया है कि व्यवधान के बजाय एकसूत्रता व एकरूपता दिखाई देने लगती है और अलग-अलग समय के लिखे गए आलेख पूर्ण योजनाबद्ध सुविचारित किताब की तरह लगने लगते हैं। चूँकि लेखक ने एक ही विचार व पक्ष को लेकर इस पुस्तक की योजना रखी है अस्तु नवउदारवाद और हिन्दी कविता की इससे बेहतर कोई दूसरी किताब फिलहाल हिन्दी में दूसरी नहीं दिखाई दे रही है। परमार ने अपने लम्बे आलेख ‘हिन्दी कविता लोक और प्रतिरोध’ में बुजुर्ग पीढ़ी से लेकर आज की और आने वाली युवा पीढ़ी तक के कवियों पर बड़ी बेबाक राय रखी है जिस भी लेखक को लोक के विरुद्ध या कलावादी देखा तो उसकी निर्मम आलोचना भी है। कविता और कवियों पर बात करते समय परमार कहीं भी निर्णायात्मक तर्कहीन नहीं होते, न ही अनगढ़ व अप्रासांगिक उद्धरण देकर आलेख को आप्त वाक्य बनाने की कोशिश करते हैं। वह किसी भी आलेख में पूर्व आलोचकीय अभिमत नहीं देते वह कविता और अपनी विचारधारा की अन्तर्संगति द्वारा खुद का निर्णय देते हैं, किसी अन्य समझ की सहायता नहीं लेते हैं। यह आज की अकादमिक आलोचना से बिल्कुल अलग अन्दाज है परमार की आलोचना व सैद्धांतिकी उसके निर्णयों से समझी जा सकती है कविता की भाषा, लोक की समझ और रचना प्रक्रिया पर बात करते हुए उमाशंकर परमार कहते हैं– “भाषा का संकट आज की कविता का सबसे बड़ा संकट हैमहानगरों में रहने वाले अधिकांश कवि भाषा के मौलिक श्रोत लोक से कटे हुए हैं ये कवि अपनी कविता में एक ऐसी पेशेवर भाषा का प्रयोग करते हैं जो कविता के समक्ष मौलिकता का संकट खड़ा कर देती है” आज की कविता के सन्दर्भ में लोक की अवधारणा के बारे में वे बहुत तार्किकता से बात करते हुए कहते हैं और लोक के नाम पर दक्षिणपंथी कवि, प्रेम गीत गाने वाले फर्जी लोकवादियों को जमकर लताड़ते हैं वे आगे कहते हैं- “आज की कविता के सन्दर्भ में जब लोक पर बात होती है तो सबसे बड़ा खतरा लोक की समझ का खड़ा जाता है लोक के प्रति एक सुसंगत नजरिया न होना आज की कविता के लिए संकट खड़ा कर रहा है लोक के बारे में उमाशंकर परमार के विचार एकदम स्पष्ट हैं वे कहते हैं– “लोक ही आम आम जनता है जो गाँवों से लेकर शहर तक व्याप्त है।“ यही लोक आदिकाल से लेकर आधुनिककाल तक हमारी रचनाधर्मिता का हेतु रहा है लोक ही कविता का विषय है व लेखक का सरोकार है इसी लोक को विषय बनाकर लिखा गया साहित्य लोकधर्मी साहित्य कहलाता है लोक से इतर लिखा गया साहित्य, सामन्तवादी, लोक विमुख एवं प्रतिक्रियावादी साहित्य ही  हो सकता है क्योंकि लोक ही पक्षधरता है लोक को अस्वीकार करने का आशय है पक्षधर न होना व प्रतिबद्द न होना लोक के सन्दर्भ में कैलाश गौतम की कविता पर विचार करते हुए वे लिखते हैं– “कैलाश गौतम की कविता लोकधर्मी कविता है लोकधर्मी कविता के सभी मौलिक लक्षण कैलाश जी की कविताओं में उपलब्ध हैं विचार, प्रतिबद्धता और संघर्ष के स्तर में इनकी कविता उत्कृष्ट है वे आगे कहते हैं– “लोकधर्मी कवि की सबसे बड़ी विशेषता होती है कि वह अपने लोक की परम्परा, रीतियों के साथ-साथ चरित्रों का भी उल्लेख करता है।“ ये चरित्र लोक की विसंगतियों और त्रासदियों के भोक्ता होते हैं इनके माध्यम से कवि या लेखक अपने सरोकारों की अभिव्यंजना करता है ये चरित्र ही कवि के वैयक्तिक और सामाजिक सवालों के जवाब देते हैं वरिष्ठ कवि और ‘दुनिया इन दिनों’ जैसी चर्चित पत्रिका के सम्पादक सुधीर सक्सेना की बहुचर्चित लम्बी कविता ‘धूसर में बिलासपुर’ की चर्चा करते हुए उमाशंकर कहते हैं– ‘धूसर में बिलासपुर केवल लोक का विषयपरक आख्यान ही नहीं प्रस्तुत करती अपितु लोक से अपनी ऊर्जा उपार्जित करते हुए लोक की सामायिक त्रासदियों का मुकम्मल विवेचन भी करती है।‘ लेखक की स्मृतियों का बार-बार अतीत में जाना, अतीत के  अवशेषों की पड़ताल करना, उन्हें पूँजीवादी, बाजारवादी परिवेश के  बरक्स चिन्हित करना, कवि के अंतर्मन में उपस्थित बिलासपुर के सूक्ष्म आक्रोश की प्रतिक्रिया है बिलासपुर के प्रति अभिव्यंजित नास्टेल्जिया यथार्थ की अभिव्यक्ति को धारदार बना रहा है हमारे समय के जाने-माने कवि और चित्रकार कुँवर रवीन्द्र यथार्थवादी सौन्दर्यबोध के कवि हैं उनके चित्र और कविताएँ हिन्दुस्तानी अवाम की मनोव्यथा की कथा कहते जान पड़ते हैं उनके कविता संग्रह ‘रंग जो छूट गया था’ की चर्चा करते हुए उमाशंकर लिखते हैं– ‘रवींद्र की कविताओं में हिन्दुस्तानी अवाम का वह अनुभव अभिव्यक्त हुआ है जो उनके चित्रों में छूट गया था।‘ इनकी कविताओं में हिन्दुस्तान का आमजन साकार हो गया है समूचा लोक अपनी सामयिक वस्तुस्थिति के साथ रवीन्द्र जी की कविताओं में उतर आया है    

‘प्रतिपक्ष का पक्ष’ पुस्तक में कविता के वर्तमान रचनात्मक संकट व लोक की अवधारणा तथा सौन्दर्यबोध की वर्गीय दृष्टि को समाहित करते हुए कविता में प्रतिरोध की परंपरा का विवेचन किया गया है साथ ही समकालीन कविता के युवा व वरिष्ठ कवियों की महत्वपूर्ण रचनाओं पर भी बात की गई है इन कवियों में विजेंद्र, सुधीर सक्सेना, केशव तिवारी, कुँवर रवीन्द्र, बुद्धिलाल पाल, शम्भू यादव, संतोष चतुर्वेदी, महेंश चन्द्र पुनेठा और अजय सिंह हैं लोक की प्रतिरोध परम्परा को स्पष्ट करने के लिए मान बहादुर सिंह और कैलाश गौतम पर भी दो महत्वपूर्ण लेख लिखे गए हैं इस प्रकार हम देखते हैं कि ‘प्रतिपक्ष का पक्ष’ लोकधर्मी काव्य परम्परा को स्पष्ट करते हुए आज के रचनात्मक सरोकारों को चिन्हित करने और उनके पक्ष में मजबूती से खड़े रचनाकारों की रचनाधर्मिता को सामने लाने में पूर्णतया सफल है 

                      

समीक्षित कृति : 'प्रतिपक्ष का पक्ष(आलोचना)

रचनाकार : उमाशंकर सिंह परमार, पृष्ठ : 196 (पेपरबैक),       

प्रकाशक : लोकोदय प्रकाशन, लखनऊ  

 

 मो.- 9336453835

Wednesday, 29 October 2025

कारावास

इन कविताओं के कवि के पैरों-हाथों की बेड़ियाँ उसके विचारों को अनंत तक उड़ने के पंख दे देती हैं जिनकी मदद से वह एक अलग ही कविता संसार में निरंतर उड़ान भरता है। कभी कान में किसी रेशमी डोर से गुदगुदी पर उसके भीतर कहकहा बन जाता है। कभी उसे लगता है मन पागल हो जाएगा। वह आईसीयू में भर्ती, थके हुए अपने नाविक को इस हाल में भी परिवार की चिंता करते हुए पतवार के लिये पूछते देखता है, चिरविदा ले चुकी माँ से मोबाइल पर बात करना चाहता है। कभी वह पूछता है- घर जाने को निकले कितने, कितने सचमुच में घर गये, कितने बचे कितने मर गये? उसे देश और देह दोनों समान अराजक और उच्छृंखल लगते हैं। पृथ्वी उसे क्रोध और प्रेम का पर्याय लगती है। बीमारियों के बीच आसन्न मृत्यु की आहटों के बीच उसे दाम्पत्य की चुहुल सूझती है जिसे वह चाय बनाने से लेकर किचकिच से दूर किचन और शयनकक्ष के बीच आवाजाही करने देता रहता है। प्रेयसी के कांधे की सिहरन और पैरों की थिरकन को भांप लेने का उसका पुरूष कौशल आवृत्त चेहरे के पीछे भी देख लेता है।

         कोरोना काल की ये कविताएँ जैसे समूचे जीवन को आईना दिखाती हुई एक आम आदमी के जीवन को एक खुले कारागार की तरह बिंबित करती चलती हैं जो रोटी के लिये घर त्यागता है और जीवन बचाने की आपाधापी में पुनः घर को दौड़ता है। घर की चहारदीवारी में सुरक्षित और सुविधासम्पन्न जीवन में भी जकड़ चुकी ऊब इन कविताओं में उभर उभर आती है। एक महामारी द्वारा थोपे गये ये पल अपने साथ एकाकी जीते हुए हताशा, आशा, विराग, उल्लास, भय, आश्वस्ति, नैकट्य और विछोह का जीवन वृत्तांत लिपिबद्ध करती चलती हैं। मृत्यु की बात करते इनमें जीवन दिखता है और जीवन से होते हुए वे मृत्यु तक हो आती हैं।

Friday, 30 August 2024

जीवन एक बहती धारा....

 पुस्तक समीक्षा

चलो फिर से शुरू करें (कहानी संग्रह)

लेखक - सुधा ओम ढींगरा

प्रकाशक- शिवना प्रकाशन, सीहोर, मप्र 466001

प्रकाशन वर्ष - 2024

समीक्षक - जसविन्दर कौर बिन्द्रा 


    
    लगातार साहित्य लेखन से जुड़ी सुधा ओम ढींगरा अपने नवीन कहानी संग्रह 'चलो फिर से शुरू करें' के साथ पाठकों के सम्मुख उपस्थित हुई हैं। लंबे समय से प्रवास में रहने के कारण सुधा जी के साहित्य में प्रवासी भारतीयों को मुखर रूप से देखा जा सकता है। उनसे जुड़े पारिवारिक रिश्तों व अन्य समस्याओं को कहानी के केंद्र में रखकर, भारत व प्रवासी संदर्भों के बीच पुल का काम भी करती है और पाठकों को वहाँ के परिवेश से परिचित भी करवाती है, जिनकी जानकारी हमें यहाँ बैठे नहीं होती। सामान्यतः भारतीयों को लगता है कि विदेशों और विशेषकर अमरीका में बसने वालों को भला कोई तकलीफ या परेशानी कैसे हो सकती है!

    'वे अजनबी और गाड़ी का सफरकहानी हमें एक ऐसे विषय से अवगत करवाती हैजिसे अक्सर फिल्मों व अंतर्राश्ट्रीय सीरियलों में देखा जाता है। दो भारतीय पत्रकार युवतियों ने एक चीनी युवती को यूरोपीय पुरुष के साथ रेलगाड़ी में जाते देखा परन्तु वह लड़की बहुत तकलीफ में प्रतीत हो रही थी। उन दोनों युवतियों ने किस होशियारी व सर्तकता से उस लड़की को ड्रग माफिया से मुक्त करवायावह कहानी पढ़ने से ही पता लगता है। इस कहानी को केवल 'एक्साइटिटकरने या आज के दौर की सनसनीखेज़ घटना के तौर पर नहीं देखा जा सकताक्योंकि वास्तव यह कहानी हमें अपने और अमरीकी तंत्र व पत्रकारिता के बीच के अंतर को दर्शाती है। वहाँ एक युवती पत्रकार के एक मैसेज पर सिक्योरिटी ऑफिसर्ज़ द्वारा 'हयूमन ड्रग बॉम्बके तहत उठायी जा रही उस चीनी लड़की को उस पूरे गैंग से मुक्त करवा लिया गया।

    रेलगाड़ी अपनी गति से चलती रहीयात्री अपने-आप में व्यस्त बैठे रहें और एकदम सावधानी और सर्तकता से बिना कोई शोरगुल मचाएहाय-तौबा किएलड़की को बचा लिया गयामैसेज करने वाली लड़की की तारीफ भी कर दी गई। यहाँ तक कि उसके अखबार के मुख्य संपादक को उसका प्रशंसात्मक पत्र तक भिजवा दिया गया। भारत में हमने ऐसा कभी होते देखा हैइतनी सजगताइतनी सर्तकताबिना देर किए कदम उठा लेना...! वास्तव में ऐसी बातें यूरोपीय व अमरीकियों से सीखनी वाली हैंगारंटी हैजो हम कभी नहीं सीख पाएँगे।




    अंधविश्वास केवल एशिया व भारत में ही सर्वोपरि नहींबाहर के देश भी इसके प्रभाव से मुक्त नहीं। वहाँ भी ग्रामीण क्षेत्र हमारे समान ही पिछड़े हुएकई प्रकार के दुरावों व पाप-पुण्य के बीच उलझे हुए हैं। इसी कारण जब अगाध सुंदरी डयू स्मिथ ने गौरव मुखी को अपने जीवन के काले अतीत के बारे में बताया तो एक बार वह यकीन न कर पाया। उसे यह जानकर अत्यन्त हैरानी हुई कि डयू के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआजैसाकि किसी भी सुंदर लड़की को जवान होने पर बुरी नीयत और दुश्कर्म से गुज़रना पड़ सकता है परन्तु माँ-बाप ने अपने धर्माधिकारी के चरित्र पर संदेह न किए जाने के अपने रूढ़िवादी और अंधविश्वासी व्यवहार को निभाया। जबकि डयू उस दुश्कर्म के कारण एच आई वी वायरस की लपेट में आ गयी। अपनी मेहनत व योग्यता के बल पर वह एक बड़ी कंपनी में उच्च पद पर पहुँच गयीउसके पास सब कुछ था परन्तु उसकी सुंदर नीली आँखें उदास बेनूर थीजिसके पीछे का रहस्य आज गौरव को समझ में आया था। इसलिए डयू उससे शादी नहीं करना चाहती थी क्योंकि वास्तविक जीवन में ऐसा करना संभव नहीं था। इस बीमारी का इलाज सारी उम्र करना पड़ता है। बाहर के देशों में ऐसी बीमारी के मरीज़ ज़्यादा है परन्तु इसके बाद भी वे जीवन में आगे बढ़ते हैंसमाज उन्हें उस प्रकार से नहीं दुत्कारताजिस प्रकार का व्यवहार हमारे यहाँ परिवार व समाज द्वारा किया जाता है।

    'वह ज़िन्दा है...कहानी हस्पताल की उस वास्तविकता को दर्शाती हैजिसमें अल्ट्रासाउंड करने वाली नर्स कीमर्ली ने जब एकदम सपाट तरीके से गर्भवती कविता से कह दिया कि 'मिसेज़ सिंह युअर बेबी इज़ डेड।ऐसा सुनते ही कविता के शरीर की गति वहीं रुक गई। फिर जो हुआवह बहुत ही दर्दनाक था। कविता के शरीर के गतिहीन हो जाने से मृत बच्चे को बहुत मुश्किल से उसके शरीर से बाहर निकाला गया। कविता की केवल साँसें से चल रही हैं जबकि वह अपना मानसिक संतुलन खो चुकी है क्योंकि दो बार गर्भपात हो जाने के बाद यह तीसरा मौका ही उसे माँ बना सकता था परन्तु नर्स द्वारा बिना किसी भावनात्मक अंदाज़ केप्यार या फुसला कर कहने की बजाय सच को पत्थर की तरह उसके दिल पर दे मारा। जिसे कमज़ोर कविता सहन नहीं कर पायी। पति के कार को पार्क करके वापस आने तक के कुछ मिनटों में ही उस दंपत्ति की ज़िदगी उजड़ गयी। अब पति हस्पताल के मैनेजमेंट से मानवता की लड़ाई लड़ रहा है । उसका तर्क बस इतना ही है कि 'वह सच बोलने के खिलाफ नहीं पर सच को बोला कैसे जाए!यह बात विदेशियों को हमसे सीखने की आवश्यकता है। कई बार भावनात्मक स्तर को सँभालने के लिए झूठ का सहारा भी लिया जा सकता है या उसे टाला जा सकता है। वास्तव में लेखिका दो भिन्न परिवेशों व परिस्थितियों को उनके दृश्टिकोणों द्वारा अपनी कहानियों के माध्यम से प्रस्तुत करती है। इसे तुलना न भी कहा जाए तब भी लगता हैअच्छी बातअच्छी सलाह जहाँ से भी मिलेउसे सीख लेने में कोई बुराई नहीं। इससे आगे बढ़ने में मदद मिलती है।

    'भूल-भुलैयाभी कुछ इसी प्रकार के अंतर को बयान करती है। भारतीयों के वट्सएप ग्रुपों में लगातार इस प्रकार संदेश आ रहे थे कि एशियाई लोगों को अकेले-दुकेले देख करअगवा कर लिया जाता है और उन्हें मॉल्स के बड़े ट्रकों में उठा ले जाकरउनके मानवीय अंग निकाल लिए जाते है। इन संदेशों से घबरायी सुरभि ने जॉगिग करते हुए एक पार्क में उसका पीछा करते एक पुरुष-स्त्री को उसी गैंग का समझ लिया और अपने बचाव के लिए पुलिस को फ़ोन कर दिया। पुलिस ने आकर उसकी गलतफहमी दूर की कि ये सारी अफवाहें है और वे स्त्री-पुरुष उसकी सहायता के लिए उसके साथ-साथ आ रहे थे। जिस घटना के कारण ऐसी अफवाहें फैलने लगीवह एक गलती के कारण घटी और तभी खत्म भी हो गई परन्तु उस एशियन महिला ने बात का बतंगड़ बना करअटेंशन लेने के लिए कुछ का कुछ बना दिया। यह कहानी केवल विदेशों में ही नहींकहीं भी रहते हुए ऐसे फैलने वाले और फॉरवर्ड किए जाने वाले संदेशों से सतर्क करती है। जिस डिज़ीटल मीडिया की सुख-सुविधा ने हमारा जीवन आसान किया हैउस पर बढ़ती निर्भरता हमें बेआराम करने में कोई कसर नहीं छोड़ रही। भावनात्मक स्तर की बात करें तो संग्रह की बहुत सारी कहानियों में इसे प्रमुखता से देखा जा सकता है, जिसमें भारतीय पारिवारिक मूल्यों की अधिकता समायी हुई है।

    'कभी देर नहीं होतीमें ददिहाल के लाडले नंदी को माँ और ननिहाल के प्रभाव में आनंद में बदलना पड़ा। ननिहाल की चालाकी और तेज़-तर्रार भरे व्यवहार के कारण आनंद और उसके छोटे भाई को बचपन से ही दादा-दादी के प्यार व ममत्व भरे माहौल से दूर होना पड़ा। सब कुछ समझने के बावजूद उसके पापा ने मम्मी और ननिहाल के आगे चुप्पी साध ली ताकि बच्चों की परवरिश पर कोई बुरा असर न पड़े। जब इतने वर्षों के बाद अमरीका के एक शहर में रहते हुए उसकी बुआ ने 'नंदीकह कर पुकारातो वह इतने वर्षों के लंबे अंतराल के बाद उसी माहौल व अपनेपन से भर उठा। अंग्रेज़ी के दो शब्द हैंजो संबंधों के लिए प्रयोग किए जाते हैं 'कनेक्टहोना और 'रिलेशनहोना। परन्तु हम जानते हैं कि हर शब्द का अपना लहज़ाटोन व संदर्भ तो होता ही हैउसकी अनुभूति भी अलग होती है। यहाँ कनेक्शन से अर्थसंस्कारों सेभावनाओं सेअपने मूल से जुड़ा होना हैजिसमें वर्षों की दूरी भी कोई अर्थ नहीं रखती जबकि दूसरी ओर रिलेशनशिप में संबंध तब तक रहेगाजब तक आप चाहें...! इसलिए रिश्तों में कनेक्शन होना चाहिएरिलेशनशिप तो आती-जाती चीज़ है।

    ऐसा ही कुछ 'चलो फिर से शुरू करेंशीर्षक कहानी में भी देखा जा सकता है। विदेशी महिला से विवाह कर पुत्र माँ-बाप से अलग हो गया। माँ-बाप ने भी उसकी गृहस्थी में दखल देना ठीक न समझउससे दूरी बनाना उचित समझा। परन्तु जब उन्हें किसी परिचित द्वारा मालूम हुआ कि मार्थाकुशल को तलाक देकरबच्चों को उसके पास छोड़ कर चली गई। इतना ही नहींवह उसके नाम पर तीन मिलियन का कर्ज़ लेअपनी माँ के साथ चली गयी। यदि कुशल श्वेत अमेरिकन होता तो मार्था बच्चे साथ ले जाती परन्तु भारतीय अमेरिकन पिता के बच्चों को वह कभी स्वीकार नहीं करेगी। ऐसी मुश्किल स्थिति में कुशल को भुला दिए गए माँ-बाप ही याद आए क्योंकि उसे मालूम था कि उसके माँ-बाप ने उसे कभी भुलाया नहीं होगा। इसलिए उसने अपने पिता को फ़ोन किया और उनके पास अपने बच्चों को छोड़ करजीवन में एक नयी शुरूआत करने का संकल्प लिया।

    कॉलेज जीवन में ऐसे कई मित्र मिलते हैंजिनसे सारी उम्र का नाता बन जाता है और कई बार ऐसी कुछ घटनाएँ भी घट जाती हैंजिसकी कड़वाहट जीवन में घुल करपरिवार को भी बदनाम कर देती है। 'कँटीली झाड़ीमें डिप्टी कमिश्नर की बेटी होने के घमंड में खोयी अनुभा ने कॉलेज में अपना रौब बनाए रखा। परन्तु जब उससे अधिक योग्य और सुंदर नेहा पर उसका यह रौब न चला तो उसने नेहा को बदनाम करने की कोशिश की। यहाँ तक कि शादी के बाद किसी परिचित के घर पर मिलने परअनुभा ने फिर से नेहा के ड्राईवर के साथ घर से भाग जाने की बात फैला करससुराल में उसकी बदनामी करनी चाही। तब नेहा ने सभी को उसकी सारी सच्चाई से अवगत करवाया कि यह उसी के साथ घटा था। नेहा को समझ आ गया कि कुछ लोग इतने विषैले व कांटों भरे होते हैं कि उनसे न केवल बच कर रहना चाहिए बल्कि उन्हें उनकी औकात भी बता देनी चाहिए ताकि उनके खतरनाक कारनामों पर लगाम लग सके। इसी प्रकार कई बार पूजा व दीपक जैसे मित्र भी होते हैजिनकी शुरूआत लड़ाई से हुई हो परन्तु एक-दूसरे के संपर्क में आने और गलतफहमी दूर होने से दोनों ही एक-दूसरे के मददगार साबित हुए। परन्तु जीवन के लंबे समय में मित्र खो भी जाते हैंफिर ऐसी स्थिति आ जाती हैजब 'कल हम कहाँ तुम कहाँ'। कोई कहीं भी रहेंमीठी याद बन कर अवश्य दिल में समाए रहते हैं। मन क्या हैइसका चेतन/अवचेतन उसे कहाँ से कहाँ पहूँचा सकता है। सदियों से इसे जानने-समझने की कोशिश धर्मग्रंथोंशास्त्रों व फिलॉसफी द्वारा की जा रही है। कई बार निकट के संबंधों को व्यक्ति सारी उम्र समझ नहीं पाता और कई बार दूर-देश में बैठे अपने बच्चों की दुख-तकलीफ को माँ-बाप अपने घर में बैठे महसूस करतड़पने लगते है। कई लोगअपनों के अलावा दूसरों के दुख-दर्द या किसी आने वाले अनिष्ट को भांप लेते हैं। यह सब अबूझ पहेली समान हैजिसकी थाह पाना संभव नहींउस व्यक्ति के लिए भी नहींजिसे कुछ अप्रिय घटने का अंदेशा होने लगता है। माना जाता है कि सारा ब्रह्यांड एक-दूसरे से जुड़ा हुआ हैइससे बाहर कुछ भी नहीं। इसलिए प्रकृति में कुछ भी घटने का भासविशेषकर अप्रिय व दुखद घटने का एहसास संसार के कुछ जीवों को होने लगता है। कुछेक मनुष्यों को ऐसी अनुभूतियों का एहसास होना उनके अपने बूते की बात नहीं होती मगर कभी-कभार ऐसा होता है। ऐसी अनुभूतियों को लेकर दो कहानियाँ इस संग्रह में शामिल है। 'इस पार से उस पार' में सांची को ऐसा कुछ का एहसास अपने बचपन से ही होने लगा। उसने जब अपने परिवार व गली-मुहल्ले में एक-दो घटनाओं के बारे में घटने से पहले ही बता दिया परन्तु उसके परिवार वालों ने इसे गंभीरता से नहीं लिया। बल्कि उसकी इस अनुभूति को हमेशा के लिए दबा देने की कोशिश की। बरसों बाद उसने फिर एक बार अपनी सखी अनुघा को फलां समय पर सड़क पार करने से चेतावनी देकर उसे बचा लिया।

    'अबूझ पहेलीनामक कहानी की मुक्ता धीर को 9/11 के हवाई जहाज़ हादसे के दृश्य कुछ दिन पहले से ही नज़र आने लगे थे। उसे बार-बार दिखायी दे रहे इस दृश्य की समझ नहीं आ रही थी। परन्तु उसका तन-मन उदासक्लांत और निर्जीव महसूस कर रहा था। अपने पति व बेटे को बता देने के बावजूदउसे स्वयं पर भी यकीन हो रहा था। परन्तु वर्ल्ड ट्रेड सेंटर का हादसा सच में घट गयाउसके पति व बेटे को उसकी बात पर यकीन आ गया । परन्तु इतने बरसों बाद भी मुक्ता स्वयं इस पहेली को बूझ नहीं पायी कि उसे वे दृश्य कुछ दिन पहले कैसे दिखायी देने लगे थे। वास्तव में मनुष्य विज्ञानमेडिकलअंतरिक्ष व तकनीकी स्तर पर कितनी भी प्रगति कर लेंप्रकृति और मन के बहुत सारे रहस्यों को समझ पाना अभी भी उसके वश की बात नहीं है।

    सुधा ओम ढींगरा की सारी ही कहानियाँ उसके शीर्षक 'चलो फिर से शुरू करें' को ही सार्थक करती है। मानवीय जीवन उतार-चढ़ाव का ही नाम है। इसमें हिम्म्त रखकर, डट कर चलने वाले ही जीवन की बहती धारा को पार सकते हैं।

-000-


संपर्क-

जसविन्दर कौर बिन्द्राआर-142प्रथम मंज़िल

ग्रेटर कैलाश-1नई दिल्ली- 110048

मोबाइल- 9868182835

ईमेल- jasvinderkaurbindra@gmail.com