Showing posts with label किताब चर्चा. Show all posts
Showing posts with label किताब चर्चा. Show all posts

Friday, 17 April 2026

ताजी ठण्डी हवा सी मोहक चक्रधारी राधा

लघुकथा विधा में वर्तमान समय स्वप्नवत और गतिमान प्रकार का है। अपनी ऊर्जा के साथ न्याय करने के स्थान पर उसे मात्रात्मक परिणामों पर केन्द्रित करने का चलन न केवल बढ़ रहा है, स्वीकार्य भी हो चला है। एक विधा के साथ जीते हुए मात्र उसके कलेवर, शैली और शास्त्रोक्त प्रकार के सांचे में ढ़ली रचनाओं को लगातार परोसते रहना ही नहीं वरन उसके पोषण को लेकर जागरुक रहना भी प्रत्येक लेखक का कर्तव्य बन जाता है। डॉ. नीना छिब्बर लघुकथा विधा की स्थापित हस्ताक्षर हैं और अपने अनुशासित लेखन, विषय वैविध्य और किसी सोच विशेष के ठप्पे से परे के सृजन हेतु जानी जाती हैं। 

प्रस्तुत संग्रह अपने इंद्रधनुषी अस्तित्व और समाधानपरक सोच के चलते भीड़ में अलग स्थान रखता है। कोरे कल्पना विलास से परे वास्तविक तथ्यों की पड़ताल करते विषय और सीधी सरल भाषा पाठकों को बांधने में सक्षम है। लीक से हटकर विषय जो प्रकृति की हरियाली से लेकर जीवन में स्थायित्व के दोराहे पर उलझाती परिस्थितियों को साथ लिये चलते हैं, उनका जन्म लेखिका की अनुभवी रचना कोख से हुआ है। पुस्तक की शीर्षक लघुकथा नावीन्य का पुट लिये हुए है।

माॅं का द्वंद्व जैसी लघुकथाऍं असमंजस के दोराहे पर लाकर खड़ा कर देती हैं ।वहीं आत्मकथात्मक शैली की लघुकथा एक जागरण का संदेश देती प्रतीत होती है। नशामुक्ति, स्व कारावास जैसे वर्तमान में अछूते विषय एक आशा जगाते हैं। पर्यावरण पर आपकी चिंता अनेक रचनाओं में से परिलक्षित होती है। सिरदर्दी जैसी लघुकथा नवीन तकनीक और अकेलेपन के बीच की उहापोह को बेहतर व्यक्त करती है। कुछ लघुकथाऍं भविष्य की यात्रा पर भी ले जाती हैं।
कृषि और युवाओं को जोड़ती, नैतिक मूल्यों से सजी लघुकथाऍं हमें समय की तत्कालीन नकारात्मकता से परे एक उजास का मार्ग दिखाती हैं। बाल मनोभावों पर लेखिका की अच्छी पकड़ है। बारीक संवेदनाएं, नन्हे सुख और छोटी सी इस खुशनुमा दुनिया में इनकी कई रचनाओं के द्वारा यात्रा करना सुखद लगता है।
इन रचनाओं में कहीं -कहीं कल्पना पक्ष भारी पड़ता है और लेखिका के भावों के अनुरुप पाठकीय दृष्टि तैयार करने में थोड़ा समय भी लगता है। इन रचनाओं में विषय ताज़े हैं, कुछ तो आवश्यक हैं और कुछ सांकेतिक भी हैं। कुछ स्थानों पर रचनाओं में कथा तत्व पर और भी काम किया जाना संभव था जहाॅं पर वे विचार से थोड़ा आगे जा सकते थे।
प्रत्येक लेखक की कहन कुछ रचनाओं की रियाज़ के बाद ही साकार हो पाती है। यही तत्व नीना छिब्बर जी की रचनाओं पर लागू होता है। उनका जीवन को, जग को और फलसफों को देखने का एक अलहदा अंदाज़ है जो उन्हें वर्तमान लघुकथा लेखकों से अलग करता है। नवीन विषय को उठाने और उसपर प्रयोग करने में वे अधिक सोच विचार नही करती। प्रस्तुत संग्रह में कोई भी विषय ऎसा नही है जिसे घिसा पिटा या घर- घर की कहानी के समान कहा जा सके।
नैतिक मूल्य यदि हैं भी तो उनकी वास्तव में समाज को आवश्यकता है और वे उपदेशों की चाशनी से परे सत्य के नमकीन घोल में डूबे हुए हैं। अपनी लेखनी से स्वयं को रेखांकित करने का भाव लेखिका में नही मिलता जो कि दुर्लभ है और यही उन्हें एक स्तर आगे ले जाता है, जहाॅं पर वे अपने विचार, लेखनी और सर्जना से समाज को एक बेहतरी का उपहार देने के लिये तत्पर है। अलग विषय और षडरस के आनंद से परिपूर्ण इस संग्रह का स्वागत है। लेखिका की उर्वर मनोभूमि से आगे सर्जना की सुनहरी फसल आती रहे, शुभकामनाएं और बधाई!
                                                                                                             अंतरा करवड़े
                                                                                                             अनुध्वनि
                                                                                                             117, श्रीनगर एक्स्टेंशन
                                                                                                             इंदौर 452018
                                                                                                             म.प्र.

Thursday, 16 April 2026

वर्तमान साहित्य के नक्कारखाने में पाठकीय असहमति के स्वर

इसमें कोई संदेह नहीं कि वर्तमान साहित्य, खासकर हिन्दी साहित्य जगत में बड़ी हद तक एक विचारधारा के प्रति झुकाव, लेखकों की खेमेबाजी, अनावश्यक विमर्शप्रियता एवं स्त्री यौन स्वातंत्र्य का परचम सायास लहराने की प्रवृत्ति परिलक्षित होती है। दलित विमर्श और स्त्री विमर्श के जुनून में भी कई प्रतिष्ठित लेखकों यथा प्रेमचंद, सुभद्रा कुमारी चौहान, शिवानी, अमृतलाल नागर, शैलेश मटियानी को न केवल खेमेबाज़ लेखकों से कमतर आँकने बल्कि कई बार अपमानित तक करने का प्रयास किया जाता रहा है। इतना ही नहीं, वर्तमान में महिलाओं सहित साहित्यकारों का एक बड़ा वर्ग यथार्थ लेखन के नाम पर देह विमर्श की आड़ लेकर यौन क्रियाओं एवं यौन विकृतियों का यथारूप चित्रण करने की हिमायत करने में कमर कस के उठ खड़ा हुआ है। स्वाभाविक है कि बदलते लेखकीय सरोकारों और प्रतिबद्धताओं के नाम पर जो लिखा जा रहा है, वह कई बार स्थापित नैतिकता, परंपरागत जीवन मूल्यों और परिष्कृत पाठकीय अभिरुचि के विपरीत होता है।

ऐसे परिवेश में वरिष्ठ कथाकार, व्यंगकार तथा समालोचक श्री राजेन्द्र सिंह गहलौत, बतौर एक जागरूक पाठक, उपरोक्त प्रवृत्तियों के खिलाफ अपनी असहमति के स्वर लगातार उठाते रहे हैं। पाठकीय अभिरुचि, पठनीयता के संकट, साहित्य में यथार्थवाद, यौन स्वातंत्र्य, देह-विमर्श, भाषा और भाषाई शुद्धता जैसे विषयों पर उनके गंभीर-विचारोत्तेजक आलेख विभिन्न साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में लगातार आते रहे हैं। ऐसे ही 23 आलेखों का संग्रह ‘असहमति के स्वर’ लोकोदय प्रकाशन, लखनऊ से प्रकाशित हुआ है। यह आलेख संग्रह उनके पूर्व प्रकाशित दो आलेख संग्रहों ‘इस हमाम में’ तथा ‘पाठकीय अभिरुचि और साहित्य’ ही की तरह शोधपरक, विश्लेषणात्मक एवं विषय वैविध्य समृद्ध है।
श्री गहलौत हिन्दी साहित्य के पाठकों की उस क्लासिक श्रेणी के मुखर प्रतिनिधि हैं, जो साहित्य के नाम पर परोसे जा रहे अश्लील, अरुचिकर, भदेस और कई बार भामक तथ्यों की खुलकर आलोचना करते हैं, उन्हें ख़ारिज करते हैं। प्रस्तुत संग्रह के एक आलेख ‘सिर्फ और सिर्फ साहित्यकार चाहिए’ में वे इस बात को मुखरता के साथ रेखांकित करते हैं कि विभिन्न विमर्शों के रंग में रंगे रचनाकर, विशेष विचारधारा के प्रचार-प्रसार का संकल्प लिए मिशनरी साहित्यकार एवं साहित्यिक पत्रिकाएँ तो यत्र तत्र सर्वत्र दिखलाई पड़ रहे हैं लेकिन सिर्फ साहित्यकार एवं साहित्यिक पत्रिकाएँ साहित्य जगत के परिदृश्य से विलुप्त होती जा रही हैं। वे इसी आलेख में कहते हैं, ‘नई-नई विचारधाराओं के इश्तहार वर्तमान साहित्य के नाम पर बांटे जा रहे हैं और इन प्रयासों में बंटते जा रहे हैं साहित्यकार, रचनाकर।’
श्री गहलौत उपरोक्त संग्रह में शामिल कई आलेखों के माध्यम से इस प्रश्न को शिद्दत से उठाते हैं कि क्या देहविमर्श यौन सम्बंध विमर्श का पर्यायवाची हो सकता है और क्या यौनक्रियाओं के यथारूप चित्रण के बिना लेखकीय संप्रेषणीयता या पाठकों के बीच उस लेखन की स्वीकार्यता बाधित होती है? वे इस तथ्य को भी बार-बार रेखांकित करते हैं कि साहित्य में देहविमर्श के नाम पर जो कुछ चल रहा है, वह स्त्री यौन शोषण या यौन विकृति पर संजीदगी से बात करने के बजाय फ्री सेक्स के नाम पर बनाए गए स्वछंद यौन सम्बन्धों की वकालत करता है। ऐसी वकालत भी खासकर महिलाओं द्वारा किए गए स्वच्छंद यौनाचार की अधिक होती है। प्रस्तुत संग्रह के कई आलेख यथा ‘स्त्री यौन स्वातंत्र्य समर्थक लेखन क्या स्त्री हितों के अनुकूल है?’, ‘बुद्धिजीवियों द्वारा अनैतिकता एवं अप्राकृतिक सम्बन्धों की हिमायत क्यों?’, ‘क्या यौन विकृतियों को स्वीकारा एवं स्थापित किया जा रहा है?’ तथा ‘देहवादी साहित्यकार क्या बदतर नहीं होते?’ इसकी बानगी हैं।

लेखक अपने आलेखों ‘वर्तमान साहित्य में यथार्थवादी लेखन क्या सिर्फ अँधियारा ताकता है?’ एवं ‘यथार्थवाद, संवेदनशून्य दृष्टि और शिल्प का चमत्कार’ में इस तथ्य को भी रेखांकित करते हैं कि यथार्थवादी लेखन महज यथार्थ का रिपोर्ताज़ नहीं है और न ही किसी समाचार पत्र की सनसनीखेज खबर है। वह यथार्थ से उठाए गए कथ्य की ऐसी प्रस्तुति है जिसमें समाज एवं मानव हित की भावना निहित हो।
वस्तुत: यथार्थवाद के नाम पर इसके विपरीत हो रहा है। बक़ौल लेखक वर्तमान साहित्य में व्याप्त अंधकारमय यथार्थवादी साहित्य में जहाँ आशा, विश्वास, उल्लास, जिजीविषा, संघर्ष का प्रकाश दबकर रह गया है, वहीं परिवेश-अन्वेषी यथार्थवादी लेखन ने मानव जीवन को, मन की भाषा को बाँचना छोड़ दिया है। लेखक यह भी मानते हैं कि यथार्थवादी रचनाकर कथ्य के प्रस्तुतीकरण में शिल्प चातुर्य दिखलाता है, भाषा के कौशल से उसे संवारता है तब कहीं जाकर वह प्रभावशाली रचना रच पता है। इस रचना प्रक्रिया में रचनाकार को इतनी फुर्सत कहाँ कि वह घटना, पात्र एवं स्थितियों को जी सके। उसके पास इतना धैर्य कहाँ कि वह उस घटना एवं पात्र में अपने आपको रखकर उनकी वेदना से संवेदित हो सके।
वर्तमान साहित्य और उसके साहित्यकार जहाँ पाठकों के न होने का रोना रो रहे हैं, सदियों पहले लिखी गई अलिफ लैला, सिंहासन बत्तीसी जैसी रचनाएँ आज भी पाठकों के बीच लोकप्रिय हैं। इसी बात को रेखांकित करते हुये आलेख ‘वर्तमान साहित्य की पठनीयता का संकट : दोषी कौन?’ में लेखक कहते हैं कि आधुनिक कहानी विभिन्न आंदोलनों, प्रयोगवादों, विमर्शों और विचारधाराओं का शिकार हो गई, जिससे उसकी पठनीयता कम होती गई। पठनीयता कम होने का एक अन्य कारण है आधुनिक लेखन आम पाठकों हेतु बोधगम्य, रोचक एवं पठनीय नहीं रह गया है। लेखक का मानना है कि रचनाकारों को वाद, विशेष विचारधारा और विमर्श इन सबके बंधनों से बाहर निकलकर लेखन को पाठकों कि अभिरुचि के अनुरूप ढालना होगा।
कई लेखकों को लगता है कि लोक व्यवहार और सामाजिक मर्यादाओं का अतिक्रमण करके ही यथार्थ रचा जा सकता है। उनकी सफलता लक्ष्मण रेखाओं को लांघने में ही निहित होती है। पर क्या सचमुच ऐसा है? संग्रह के आलेख ‘वर्तमान साहित्य में यथार्थवाद क्या एक भामक अवधारणा है?’ में साहित्य में रचे जा रहे आदर्शोन्मुखी यथार्थ से लेकर समाजवादी यथार्थ तक और अब जादुई यथार्थ की अवधारणा के प्रस्तुतीकरण की पड़ताल की गई है। रचनाओं में प्रस्तुत इस जादुई यथार्थ का शिकार हो रहा आम पाठक सुरुचि सम्पन्न तथा चैतन्य होने के बावजूद निरुपाय होता है। वह परोसे गए लेखन की सामग्री देखकर सकुचाता है और फिर उस सामग्री व उसे परोसने वाले लेखक की उपेक्षा करता है। अति हो जाने पर वह ऐसे लेखकों को चुपचाप अस्वीकृत भी करता है, इसमें दो राय नहीं।
संग्रह के कुछ अन्य आलेख यथा ‘हिन्दी भाषा की देवनागरी लिपि की उपेक्षा क्यों?’, ‘लोकभाषा की अस्मिता का प्रश्न’, ‘क्या पुरस्कारों का कोई सम्मान नहीं होता?’, ‘नास्तिक साहित्यकारों द्वारा हिन्दू धर्म, देवी-देवता एवं वेदग्रन्थों का मज़ाक उड़ाना क्या प्रगतिशीलता है?’ और ‘थर्ड जेंडर या ट्रांसजेंडर नहीं सिर्फ यौन विकलांग’ अपने आपमें बेहद महत्वपूर्ण हैं तथा गंभीर विमर्श की मांग करते हैं।
- प्रतिभू बनर्जी
आलेख संग्रह – असहमति के स्वर
लेखक – श्री राजेन्द्र सिंह गहलौत
प्रकाशक – लोकोदय प्रकाशन, लखनऊ
कुल पृष्ठ – 200
मूल्य - रु 350/-

Saturday, 28 March 2026

आत्म कथ्य

             मैं पेशे से डॉक्टर हूँ और यही चाहती थी कि तन मन से सिर्फ मरीजों की ही सेवा करूँ। पर मेरे मन की बांसिया, बेसुरी ही सही, बजती रही। जो भी भाव मन में उठे मैं उन्हें पन्नों पर उतारती रही। मालूम नहीं ये कविता है, नज़्म है या गीत है। बस मन के उद्गार हैं। सायास कुछ भी नहीं लिखा। कभी पूर्ण सूर्यग्रहण को देखकर चाँद से जलन हुई कि उसके आगोश में सूरज क्यों है और कभी पूनम का पूरा चाँद देखकर ख्वाहिश हुई कि काश वो आधा मेरी गोद में आ जाता।

लिखते वक्त शब्दों को चुराया नहीं कभी पर मेरी लेखनी ग़ालिब और गुलज़ार से बहुत प्रभावित रही। जो भी लिखा, कई लोग इसे स्वान्तः सुखाए भी कहते हैं। दरअसल मैंने मरीजों की सेवा भी तो अपने सुख के लिए की और इसका प्रतिफल ये रहा कि मरीजों को स्वास्थ्य लाभ के साथ-साथ खुशी भी दी। अपनी कविताओं के लिए भी यही कह सकती हूँ। आज जिस संताप में हर कोई जल रहा है उनके लिए शीतल लेप की तरह होंगी मेरी नज़्में। मुझे यकीन है कि आप सबको जरूर पसन्द आएँगी।

आखिरी में अपने इस सफर में अपने जीवन साथी अरुण को याद करना नहीं भूल सकती। उसके बिना कुछ भी सम्भव नहीं था। दरअसल हम दोनों के नाम एक ही कविता है, वो अरुण और मैं उसकी पहली किरण।

-    उषा अरुण

Sunday, 21 December 2025

आँख भर आकाश

 

“आज जीवन कठिन से कठिनतर होता जा रहा हैजीते रहने के लिए लगातार संघर्षरत रहना मजबूरी हैपूँजीवादी श्रम-विभाजन के इस माहौल में जीवन से रागात्मकता और काव्यबोध लुप्त होते जा रहे हैं, जीवन में कविता का स्पेस सिकुड़ता चला जा रहा है। ऐसे में आधुनिक जीवन की जटिलता को कविता के वितान में बाँधना आज की आवश्यकता है।“

 

https://www.amazon.in/gp/product/9387149528/

Tuesday, 9 December 2025

कवि, कविता और मेरी बात

अगर जन्म लिया है तो चुनौतियाँ आनी ही हैं और उनसे निबटना भी लाजमी है। पर किसी ऐसे व्यक्ति के सम्बन्ध में कुछ लिखना और वह भी शब्द-विस्तार की सीमा-रेखा में, जिसे आप लगभग अद्योपाँत जानते हों, भी एक बड़ी चुनौती है; क्योंकि ज़्यादा जानकारी होने पर विचार गड्ड-मड्ड होने लगते हैं और लेखन सौष्ठव बिगड़ता है, पर वह चुनौती मुझे दी गई है जो स्वयम् न कवि है न लेखक अर्थात् सौंपे गए कार्य को अंजाम देने हेतु आवश्यक और पर्याप्त उपकरणों के अभाव में लगभग अक्षम। पर कोशिश तो की ही जानी चाहिए सो कोशिश कर रहा हूँ।

इस काव्य खण्ड के रचयिता श्री ब्रह्मानन्द दुबे जैविक रूप से मेरे पूज्य चाचा थे अर्थात् मेरे पूज्य पिताजी के छोटे भाई। जब वह हाई स्कूल की परीक्षा दे रहे थे उसी दौरान उनके पूज्य पिताजी अर्थात् मेरे पूज्य बाबा की अचानक मृत्यु हो गई। किसी तरह उनको परीक्षा देने हेतु भेजा गया। ज़ाहिर है ऐसे माहौल में परीक्षा किस मनो-स्थिति में दी होगी, पर फिर भी शेष पर्चे भी लिखे और उत्तीर्ण भी हुए, द्वितीय श्रेणी में- जो उस ज़माने के हिसाब से सम्मानपूर्ण था क्योंकि उस ज़माने में (चालीस के दशक में) प्रथम श्रेणी बँटती नहीं थी और कला क्षेत्र में तो बहुत ही प्रतिभाशाली की आती थी। यह उनकी अदम्य संकल्प शक्ति का पहिला प्रमाण था जो जीवन के आख़िरी पल तक उनके साथ रही, उन्हें ज़िद्दीका विशेषण दिलाने की सीमा तक और उसके बाद उन्होंने आगे पढ़ने से मना कर दिया और बावजूद मेरे पूज्य पिताजी, जो अब उनके लिए पिता तुल्य थे तथा अपनी परम पूज्या माँ के पूरा ज़ोर देकर समझाने पर भी नहीं माने। कालान्तर में उन्होंने पहिले उत्तर प्रदेश खाद्य विभाग और फिर रेलवे में सेवा की जहाँ से वे सेवानिवृत हुए।

सेवा प्रारम्भ करने के बाद अवसर आया विवाह का, जिसके लिए उन्होंने जो की तो उसे हाँ में कोई तब्दील न करा सका; वह पूज्य माँ भी, जिनके लिए उनके भाव थे: भोली भाली सरलता की त्यागमयी सौम्या मूर्ति जिनमें मुझे देवी माँ के साक्षात दर्शन होते थे...।“

देश भक्ति, सामाजिक चेतना, कलाओं के प्रति स्वभाविक रुझान के साथ स्वयम्-प्रगल्ब्ध्ता से बचने के पारम्परिक संस्कार पूरे परिवार में थे जिसकी एक बानगी उन्हीं के शब्दों में: मेरे ताऊजी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे- 15 अगस्त को देश स्वाधीन हुआ- इस अवसर पर ताऊजी ने मुझसे भारत माँ का भित्ति चित्र बनवाया, उसकी पूजा-आरती करके प्रसाद वितरण करते हुए ख़ुशी के साथ बोले- आज मेरा मनोरथ पूर्ण हुआ, भारत माता की जय।

स्पष्ट है देश के लिए त्याग किया गया था, पर कोई आडम्बर नहीं और बालक ब्रह्मानन्द में भित्ति चित्र बनाने की क्षमता थी। दिखावे से दूर रहने की प्रवृति ने नुक़सान बहुत किया और उनका चित्रित किया हुआ केवल एक चित्र धूल-धूसरित अवस्था में मुझे हस्तगत हो पाया। अपने बाल साथियों के साथ पहिले बाल विनोद पुस्तकालयकी स्थापना की और एक क्लब भी बनाया गया जिसका एक अभूतपूर्व नाम रखा गया: गोबर क्लब। गोबर क्लब के उद्देश्य, संस्थापकों के ही शब्दों में:-

गौरव ओज बालकों में

भरने को राष्ट्र प्रेम का भाव,

गोबर क्लब साकार हुआ है,

लेकर अपना एक स्वभाव।“

और फिर थोड़ा वय प्राप्त करने पर द वीणापाणि म्यूज़िक अकादमीकी स्थापना, जिसके माध्यम से कन्नौज नगरी में स्तरीय संगीत सम्मेलन आयोजित हुए, के बाद जब वे दिल्ली आए तो उनकी सांस्कृतिक, कलात्मक अभिरुचियों को विस्तार मिला जिसका सबसे बड़ा कारण और सहयोग रहा उनके अग्रज श्री कृष्णानन्द दुबे और उनकी संस्था, इण्डियन सेण्टर फ़ार कल्चरल इंटिग्रेशनका। पर अभी तक उनके कवि स्वरूप का प्रादुर्भाव नहीं हुआ था। लिखते थे: पर कविता नहीं, संस्मरण या हितोपदेश प्रकार के लेख जो स्वयम् में अनन्य प्रकार की अनुभूतियाँ समेटे हैं और शैली तथा दृष्टिकोण में अनूठी हैं (उनका प्रकाशन भी करने की योजना है)। पर मुझे याद पड़ता है कि धीरे-धीरे उनकी अन्य गतिविधियाँ धीमी पड़ती गयीं और कागज़ क़लम के प्रति उनका रुझान बढ़ता गया और इसी मध्य कविता ने जन्म लिया जो बढ़ते-बढ़ते आज चौदह जिल्दों में है जिसके कलेवर का अन्दाज़ इस तथ्य से लगा सकते हैं कि प्रस्तुत कविताएँ मात्र एक जिल्द की आधी हैं। उन्होंने लिखा और ख़ूब लिखा, सभी विषयों पर लिखा। न विषय पारम्परिक, न भाषा, न शैली साँचाबद्ध, पर समझने के लिए बहुत कुछ है और इसका जो विश्लेषण उनके परम प्रिय मित्र श्री हरिहर नाथ भट्टाचार्य ने किया उससे सही और बेहतर आँकलन उनके कृतित्व का नहीं हो सकता। श्री भट्टाचार्य जी ने लिखा था: श्रद्धेय ब्रह्मानन्द!

बर्षों के अध्ययन एवम् तर्क अनुभव से मैं जहाँ जिस बिन्दु पर पहुँचता हूँ- आपके निर्मल हृदय में वह ग्राह्य सत्य वर्षों पूर्व अनायास ही प्रतिबिम्बित हो चुका होता है।

उन्होंने स्वयं भी लिखा है:-

मात्राओं का नहीं हूँ ज्ञाता प्रबोधा,

पर भावनाओं को हूँ संजोता।

पर उनकी सर्जनात्मकता आगे चलकर कविता पर ही क्यों केन्द्रित हो गई? इसका उत्तर सीधे तो नहीं मिला पर मैं लगभग सही अनुमान लगा सकता हूँ।

प्रारम्भ में तो कारण रहा होगा, जैसा उन्होंने लिखा- साहित्यिकी लेखन क्रिया एक ऐसी ज्ञान-यज्ञ विधा है जिसमें विविध सामग्रियों की आवश्यकता नहीं पड़ती। मात्र विनायकी- लेखनी, पत्र पृष्ठ व मातु सरस्वती उद्भूत उद्गारों की कृपा वांछित।

ध्यान दीजिए: सिर्फ़ लेखनी नहीं विनायकीलेखनी और जितना वह लिख गए उससे यही लगता है कि ऊनकी लेखनी पर गणेश कृपा ही थी जो इस गति से लिख पाए। ऐसे सैकड़ों प्रयोग उनकी शब्दावली में हैं। उस दिन प्रूफ़ रीडिंग करते समय आटे रोटी के लिए एक शब्द आया मधुकर’, अजीत और मैं दोनों चक्कर में पड़ गए: यहाँ मधुकर कैसे? याद आया साधु जब भिक्षा माँगते हैं तो उसे मधुकरीभी कहते हैं। तब समझ में आया कि आटा रोटी के लिए मधुकर कहाँ से आया। ऐसे कई प्रयोग उनके लेखन में हैं।  

परन्तु उनके कविता लेखन में समय के साथ एक कारण और जुड़ गया। ज़िद्दी तो वे थे ही यानी लिए गए निर्णय पर पुनर्विचार करने का कोई कारण उनकी समझ में आना लगभग असम्भव, उस पर तुर्रा यह कि स्पष्ट भाषी; यानी करेला और  नीम चढ़ा। फलस्वरूप उनके साथ उसी की निभ पाती थी जो या तो उन्हें समझे या स्नेह करे। तीसरा कारण, जो सामान्यतया होता है अर्थात् स्वार्थ सिद्धि, सो  स्वार्थी लोग उनको फूँटी आँख न भाते थे इसलिए मतलबी लोगों की दाल गल नहीं सकती थी। उन्होंने लिखा, जो स्वाभिमानी होगा, वह ईमानदार होगा, स्पष्टवादी होगा और संतोषी होगा। वो चाटुकारिता में विश्वास नहीं रखता।

ऐसे में परिचितों का दायरा संकीर्ण होते जाना स्वाभाविक था। दूसरे अपनी जन्म नगरी से अत्यधिक प्रेम होने के कारण उन्होंने दिल्ली में कोई ठिकाना नहीं बनाया और यही विचार रखा कि सेवानिवृत्ति पश्चात अपनी जन्म नगरी में ही रहेंगे। फलतः 65 वर्ष की आयु में वे दिल्ली छोड़कर कन्नौज आ गए- ऐसा निर्णय जिसको उन्होंने, आदत मुताबिक़, निभाया तो पर जो उन्हें आमरण टीस पहुँचाता रहा। ज़ाहिर है: जो कन्नौज वह छोड़कर गए थे वह अब नहीं रहा था, रहता भी नहीं और वह स्वयम् भी 45 साल से अधिक का समय महानगरीय संस्कृति में गुजारने के बाद कस्बायी संस्कृति के अभ्यस्त नहीं रहे थे। ऐसा नहीं कि वह इस नज़ाकत को समझते नहीं थे पर वह इसके साथ समझौता नहीं कर पाए क्योंकि समझौता करना उनके स्वभाव का अंग नहीं था। उनके संगी-साथी अब थे नहीं और अपने विचारों और सबसे बड़ी बात, अपनी उम्र के कारण जिस शिष्टाचार और सम्मान की अपेक्षा वह करते थे उसके लिए कन्नौज वासियों के पास समय नहीं था और समय इसलिए नहीं था क्योंकि स्वार्थ सिद्धि नहीं होनी थी। जहाँ भाव यह हों:

जिनमें नैतिकता होती

उनमें मानवता होती

आध्यात्मिकता उनमें प्रकटती

राष्ट्रीयता भी पनपती

वहाँ स्वार्थ का स्थान कहाँ ?

आगे बढ़ने से पहले यह स्पष्ट करना समीचीन होगा और यदि यह स्पष्टीकरण न दिया जाए तो उनके कृतित्व के साथ अन्याय होगा कि उनका लेखन अकेलेपन की उपज नहीं है और न ही वह किसी के प्रति आक्रोश या अपनी पीड़ा का उदबोधक है। आक्रोश है तो नैतिक मूल्यों के ह्रास पर और पीड़ा है तो सामाजिक कृतघ्नताओं के प्रति, इसमें व्यक्तिगत कुछ भी नहीं है। सही तो यह है कि अकेलेपन को उन्होंने सकारात्मक उपादान के रूप में इस्तेमाल कर लिया क्योंकि इसी से उनकी लेखनी विनायकी लेखनीबन पाई।

नैतिकता उनके लिए व अधिकतर परिवारीजनों के लिए, केवल आडंबर नहीं था। उन्होंने ब्रह्मचर्य व्रत लिया तो उसको पूरी निष्ठा के साथ निभाया और यह मैं पूरी सत्यता के साथ कह सकता हूँ इसलिए नहीं कि मैं उनका भातृज हूँ। भगवद भजन, संगीत और लेखन के अतिरिक्त उनके केवल एक ही व्यसन था: भोजन। परिणामस्वरूप पेट की छोटी-मोटी समस्याओं के अतिरिक्त वह स्वस्थ ही रहे। हाँ वह आजीवन एक किडनी पर ही गुज़ारा करते रहे क्योंकि उनकी एक किडनी जन्म से ही सूखी हुई थी और यदि उनको कभी अस्पताल ले जाना पड़ता था तो इसी कारण। पर वहाँ से भी डायलिसिस का अवलंबन लिए बिना वह लौट आते थे।

धीरे-धीरे कविता ही उनकी संगिनी बन गई। वे एक वाक्य अक्सर कहने लगे थे: चमत्कार को नमस्कार है। मैं प्रारम्भ से उनसे यह कहता रहा कि अपनी कविताओं को प्रकाशित करवाइए या मुझे अनुमति दीजिए और वह यही उत्तर देते मैं ज़रा और सुधार लूँ और सुधारने के साथ एक और कविता आ जाती। जब वह अन्तिम बार अस्पताल गए और उनको भान हो गया कि अब वह इस शरीर में अस्पताल से बाहर न आ पाएँगे तो वह बोले, जो मेरे लिए आदेश नहीं था, पर मैंने सुना, मैं जीना चाहता हूँ क्योंकि मैं अपनी कविताओं के माध्यम से समाज को कुछ देना चाहता हूँ। उन्होंने लिखा भी था:

नैतिकीय सामाजिक क्रान्ति भाव है

मन में,

क्षमतानुसार प्रकट होती वह लेखन में।

-    देवेन्द्र नाथ दुबे


Sunday, 7 December 2025

कविता पर मुकदमा

03 मार्च 2020,

 

कविता पर मुकदमासंग्रह पढ़ा। बहुत अच्छा लगा। कविताएँ सहज लगीं। बहुत गम्भीर बात को सरलता से कहने का साहस इन कविताओं में दिखाई देता है। इस विचारशून्य समय में आपकी कविताओं में विचार के साथ तंज भी है जो कविताओं को पठनीय बनाता है। इन कविताओं में हमारा समय विदग्ध रूप से हमारे सामने आता है।

कविता का सबसे जरूरी काम यह है कि वह अपने वक्त के रूबरू हो। जो कुछ हमारे समाज में घटित हो रहा है उसे कवि किस रूप में अभिव्यक्त करता है, यह चुनौती भी हमारे सामने है। अच्छा यह है कि कविताएँ सरलीकरण से बची हुई हैं। कोई घटना कविता कैसे बनती है, इसका प्रमाण कविताएँ स्वयं देती हैं।

हमारे समय में बुद्धिजीवियों की भूमिका कम सदिग्ध नहीं है। इस ढोंग को कविताएँ उजागर करती हैं।

दामोदर - बंगाल का अभिशाप, सुनो विद्याधर, मैं किस बात पर हँसूँ, कोरे कागज पर हस्ताक्षर, मेरे समय में बुद्धिजीवी, एक लड़की दुनिया की अदालत में, विषाक्त दीमकों का कुनबा इस संग्रह की श्रेष्ठ कविताएँ हैं।

कविता पर मुकदमा सीरीज की सभी कविताएँ बेहद धारदार और बोल्ड हैं। इन कविताओं में समकालीनता की बदरंग ध्वनियाँ हैं। इन कविताओं को पढ़ते हुए सहज ही भाषा पर ध्यान जाता है। आपकी भाषा सधी हुई और चुस्त है। कविता में शब्द फालतू नहीं लगते बल्कि उनका सावधानी के साथ उपयोग किया गया है।

कुल मिलाकर यह संग्रह मुझे अच्छा लगा।

शुभकामनाएँ।

 स्वप्निल श्रीवास्तव

Tuesday, 4 November 2025

प्रतिपक्ष का पक्ष – लोकधर्मिता के नए प्रतिमान

 -    प्रेम नंदन

आलोचना महज प्रशंसा या कमियाँ तलाशने का उपक्रम नही है; बल्कि किसी भी रचना या रचनाकार को समग्रता से समझने का एक साहित्यिक उपादान है आज जब आलोचना अपनी विश्वसनीयता खोती जा रही है और मात्र ठकुरसुहाती में तब्दील होती जा रही है, ऐसे में आलोचना के क्षेत्र में भी तोड़फोड़ की जरूरत लम्बे समय से महसूस की जा रही थी, ठीक इसी समय आलोचना के क्षेत्र में उमाशंकर परमार जैसे तेजतर्रार, बेबाक और तार्किक ढंग से अपनी बात कहने वाले यंग्री यंगमैन आलोचक के रूप में उभरना आलोचना के क्षेत्र में एक सुखद घटना है आलोचना के समकालीन परिदृश्य में अपनी टिप्पणियों और लेखों से हलचल मचाने वाले युवा आलोचक उमाशंकर परमार के लेखों का संग्रह है– प्रतिपक्ष का  पक्ष, जिसमें समय–समय पर लिखे गए और विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित होकर पर्याप्त चर्चा बटोर चुके उनके इक्कीस लेख शामिल हैं इन आलेखों में नवउदारवाद के आर्थिक, सामजिक व उत्तरआधुनिक, रूपवादी विमर्शों के बरक्स लोकधर्मी चेतना का वैचारिक पक्ष लेकर बहुसंख्यक जनता की जीवन समग्रता का खाका खींचने वाले लेखकों और पुस्तकों पर लिखे गए हैं

समकालीन कविता का सबसे बड़ा सच भूमंडलीकरण के परिप्रेक्ष्य में व्यवस्था का प्रतिरोध है, यह प्रतिरोध लोकधर्मी चेतना का युगसत्य है ‘प्रतिपक्ष का पक्ष’ में शामिल सभी लेख इसी व्यवस्था के प्रतिपक्ष की चर्चा करते हैं और आम आदमी के जीवन स्थितियों को चित्रित करती रचनाओं को और रचनाकारों, जिनमें समकालीन कविता के युवा और वरिष्ठ कवियों की चर्चा की गई है समय के साथ साहित्य की चिन्तन धारा भी बदलती है। कविता की रचना प्रक्रिया और शिल्प में परिवर्तन होते हैं तो आलोचना भी इन परिवर्तनों के आलोक में अपने मूल्य तय करती है। 1991 का वर्ष भारतीय इतिहास में बड़े  आर्थिक  परिवर्तन का वर्ष है। आर्थिक उदारीकरण लागू हुआ सार्वजनिक क्षेत्र में विनिवेश की प्रक्रिया तीव्र की गयी। इस नयी आर्थिक नीति का प्रभाव भारतीय आम जनता पर नकारात्मक रहा। जंगल और पहाड़ों के साथ भारतीय गाँव भी इसकी चपेट में आए। बढ़ते बाजारवाद के खिलाफ कविता और कहानी में प्रतिरोध की आवाज बुलन्द हुई। 2010 के बाद तो रचनाधर्मिता का आशय ही प्रतिरोध से लिया गया। जब रचना की मुख्यधारा प्रतिरोध है तो स्वाभाविक है आलोचना भी इस प्रतिरोध को रेखांकित करेगी क्योंकि आलोचना रचना से भिन्न नहीं होती है रचना और आलोचना एक दूसरे से जुडी हैं, एक-दूसरे की पूरक हैं। युवा आलोचक उमाशंकर सिंह परमार की किताब ‘प्रतिपक्ष का पक्ष’ साहित्य में प्रतिरोध की लोकधर्मी चेतना की पहचान कराने वाली बेहतरीन पुस्तक है। इस पुस्तक का आलोचकीय ताना-बाना प्रतिरोध और लोक को लेकर बुना गया है जिसके तहत परमार ने 2010 के बाद प्रकाशित कविता संग्रहों और कहानी संग्रहों को विशेष स्थान दिया है। इन किताबों की समीक्षा और सौन्दर्य उदघाटन में परमार भारतीय काव्यशास्त्र के सिद्धांतों को अपनी जरूरत के हिसाब से परिभाषित करते हुए रूपवादी समीक्षा व कलावाद के विरुद्ध अस्मिताओं के सवाल व हाशिए के सवालों को बड़ी शिद्दत के साथ समाहित किया है। इस पुस्तक में आज की कविता व नवनिर्मित आलोचकीय प्रतिमानों को पहचाना जा सकता है। समय के साथ आलोचना कैसे अपने औजार तय करती है, परखा जा सकता है। युवा आलोचक परमार नयी भाषा के साथ पुरानी आलोचकीय शब्दावलियों में तोड़-फोड़ करते हुए अपने अनुरूप शब्दावलियों का निर्माण किया है। साथ ही लोक और लोकधर्मिता को नए ढंग से परिभाषित करते हुए भाषा और साहित्य के विकास में लोक की भूमिका का नए सिरे से रेखांकन किया है। लोक की गतिशील संकल्पना प्रस्तुत करते हुए परम्परागत जड़ मान्यताओं व लोक सम्बन्धी फैले भ्रमों का तर्क के साथ निराकरण किया है। हालाँकि पुस्तक में सम्मिलित आलेख पूर्व प्रकाशित हैं मगर वह सारे आलेख विभिन्न समय में विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित होकर पर्याप्त चर्चा भी पा चुके हैं लेकिन ‘प्रतिपक्ष का पक्ष’ में इस क्रम से उन आलोखों को लगाया गया है कि व्यवधान के बजाय एकसूत्रता व एकरूपता दिखाई देने लगती है और अलग-अलग समय के लिखे गए आलेख पूर्ण योजनाबद्ध सुविचारित किताब की तरह लगने लगते हैं। चूँकि लेखक ने एक ही विचार व पक्ष को लेकर इस पुस्तक की योजना रखी है अस्तु नवउदारवाद और हिन्दी कविता की इससे बेहतर कोई दूसरी किताब फिलहाल हिन्दी में दूसरी नहीं दिखाई दे रही है। परमार ने अपने लम्बे आलेख ‘हिन्दी कविता लोक और प्रतिरोध’ में बुजुर्ग पीढ़ी से लेकर आज की और आने वाली युवा पीढ़ी तक के कवियों पर बड़ी बेबाक राय रखी है जिस भी लेखक को लोक के विरुद्ध या कलावादी देखा तो उसकी निर्मम आलोचना भी है। कविता और कवियों पर बात करते समय परमार कहीं भी निर्णायात्मक तर्कहीन नहीं होते, न ही अनगढ़ व अप्रासांगिक उद्धरण देकर आलेख को आप्त वाक्य बनाने की कोशिश करते हैं। वह किसी भी आलेख में पूर्व आलोचकीय अभिमत नहीं देते वह कविता और अपनी विचारधारा की अन्तर्संगति द्वारा खुद का निर्णय देते हैं, किसी अन्य समझ की सहायता नहीं लेते हैं। यह आज की अकादमिक आलोचना से बिल्कुल अलग अन्दाज है परमार की आलोचना व सैद्धांतिकी उसके निर्णयों से समझी जा सकती है कविता की भाषा, लोक की समझ और रचना प्रक्रिया पर बात करते हुए उमाशंकर परमार कहते हैं– “भाषा का संकट आज की कविता का सबसे बड़ा संकट हैमहानगरों में रहने वाले अधिकांश कवि भाषा के मौलिक श्रोत लोक से कटे हुए हैं ये कवि अपनी कविता में एक ऐसी पेशेवर भाषा का प्रयोग करते हैं जो कविता के समक्ष मौलिकता का संकट खड़ा कर देती है” आज की कविता के सन्दर्भ में लोक की अवधारणा के बारे में वे बहुत तार्किकता से बात करते हुए कहते हैं और लोक के नाम पर दक्षिणपंथी कवि, प्रेम गीत गाने वाले फर्जी लोकवादियों को जमकर लताड़ते हैं वे आगे कहते हैं- “आज की कविता के सन्दर्भ में जब लोक पर बात होती है तो सबसे बड़ा खतरा लोक की समझ का खड़ा जाता है लोक के प्रति एक सुसंगत नजरिया न होना आज की कविता के लिए संकट खड़ा कर रहा है लोक के बारे में उमाशंकर परमार के विचार एकदम स्पष्ट हैं वे कहते हैं– “लोक ही आम आम जनता है जो गाँवों से लेकर शहर तक व्याप्त है।“ यही लोक आदिकाल से लेकर आधुनिककाल तक हमारी रचनाधर्मिता का हेतु रहा है लोक ही कविता का विषय है व लेखक का सरोकार है इसी लोक को विषय बनाकर लिखा गया साहित्य लोकधर्मी साहित्य कहलाता है लोक से इतर लिखा गया साहित्य, सामन्तवादी, लोक विमुख एवं प्रतिक्रियावादी साहित्य ही  हो सकता है क्योंकि लोक ही पक्षधरता है लोक को अस्वीकार करने का आशय है पक्षधर न होना व प्रतिबद्द न होना लोक के सन्दर्भ में कैलाश गौतम की कविता पर विचार करते हुए वे लिखते हैं– “कैलाश गौतम की कविता लोकधर्मी कविता है लोकधर्मी कविता के सभी मौलिक लक्षण कैलाश जी की कविताओं में उपलब्ध हैं विचार, प्रतिबद्धता और संघर्ष के स्तर में इनकी कविता उत्कृष्ट है वे आगे कहते हैं– “लोकधर्मी कवि की सबसे बड़ी विशेषता होती है कि वह अपने लोक की परम्परा, रीतियों के साथ-साथ चरित्रों का भी उल्लेख करता है।“ ये चरित्र लोक की विसंगतियों और त्रासदियों के भोक्ता होते हैं इनके माध्यम से कवि या लेखक अपने सरोकारों की अभिव्यंजना करता है ये चरित्र ही कवि के वैयक्तिक और सामाजिक सवालों के जवाब देते हैं वरिष्ठ कवि और ‘दुनिया इन दिनों’ जैसी चर्चित पत्रिका के सम्पादक सुधीर सक्सेना की बहुचर्चित लम्बी कविता ‘धूसर में बिलासपुर’ की चर्चा करते हुए उमाशंकर कहते हैं– ‘धूसर में बिलासपुर केवल लोक का विषयपरक आख्यान ही नहीं प्रस्तुत करती अपितु लोक से अपनी ऊर्जा उपार्जित करते हुए लोक की सामायिक त्रासदियों का मुकम्मल विवेचन भी करती है।‘ लेखक की स्मृतियों का बार-बार अतीत में जाना, अतीत के  अवशेषों की पड़ताल करना, उन्हें पूँजीवादी, बाजारवादी परिवेश के  बरक्स चिन्हित करना, कवि के अंतर्मन में उपस्थित बिलासपुर के सूक्ष्म आक्रोश की प्रतिक्रिया है बिलासपुर के प्रति अभिव्यंजित नास्टेल्जिया यथार्थ की अभिव्यक्ति को धारदार बना रहा है हमारे समय के जाने-माने कवि और चित्रकार कुँवर रवीन्द्र यथार्थवादी सौन्दर्यबोध के कवि हैं उनके चित्र और कविताएँ हिन्दुस्तानी अवाम की मनोव्यथा की कथा कहते जान पड़ते हैं उनके कविता संग्रह ‘रंग जो छूट गया था’ की चर्चा करते हुए उमाशंकर लिखते हैं– ‘रवींद्र की कविताओं में हिन्दुस्तानी अवाम का वह अनुभव अभिव्यक्त हुआ है जो उनके चित्रों में छूट गया था।‘ इनकी कविताओं में हिन्दुस्तान का आमजन साकार हो गया है समूचा लोक अपनी सामयिक वस्तुस्थिति के साथ रवीन्द्र जी की कविताओं में उतर आया है    

‘प्रतिपक्ष का पक्ष’ पुस्तक में कविता के वर्तमान रचनात्मक संकट व लोक की अवधारणा तथा सौन्दर्यबोध की वर्गीय दृष्टि को समाहित करते हुए कविता में प्रतिरोध की परंपरा का विवेचन किया गया है साथ ही समकालीन कविता के युवा व वरिष्ठ कवियों की महत्वपूर्ण रचनाओं पर भी बात की गई है इन कवियों में विजेंद्र, सुधीर सक्सेना, केशव तिवारी, कुँवर रवीन्द्र, बुद्धिलाल पाल, शम्भू यादव, संतोष चतुर्वेदी, महेंश चन्द्र पुनेठा और अजय सिंह हैं लोक की प्रतिरोध परम्परा को स्पष्ट करने के लिए मान बहादुर सिंह और कैलाश गौतम पर भी दो महत्वपूर्ण लेख लिखे गए हैं इस प्रकार हम देखते हैं कि ‘प्रतिपक्ष का पक्ष’ लोकधर्मी काव्य परम्परा को स्पष्ट करते हुए आज के रचनात्मक सरोकारों को चिन्हित करने और उनके पक्ष में मजबूती से खड़े रचनाकारों की रचनाधर्मिता को सामने लाने में पूर्णतया सफल है 

                      

समीक्षित कृति : 'प्रतिपक्ष का पक्ष(आलोचना)

रचनाकार : उमाशंकर सिंह परमार, पृष्ठ : 196 (पेपरबैक),       

प्रकाशक : लोकोदय प्रकाशन, लखनऊ  

 

 मो.- 9336453835