Sunday, 7 December 2025

कविता पर मुकदमा

03 मार्च 2020,

 

कविता पर मुकदमासंग्रह पढ़ा। बहुत अच्छा लगा। कविताएँ सहज लगीं। बहुत गम्भीर बात को सरलता से कहने का साहस इन कविताओं में दिखाई देता है। इस विचारशून्य समय में आपकी कविताओं में विचार के साथ तंज भी है जो कविताओं को पठनीय बनाता है। इन कविताओं में हमारा समय विदग्ध रूप से हमारे सामने आता है।

कविता का सबसे जरूरी काम यह है कि वह अपने वक्त के रूबरू हो। जो कुछ हमारे समाज में घटित हो रहा है उसे कवि किस रूप में अभिव्यक्त करता है, यह चुनौती भी हमारे सामने है। अच्छा यह है कि कविताएँ सरलीकरण से बची हुई हैं। कोई घटना कविता कैसे बनती है, इसका प्रमाण कविताएँ स्वयं देती हैं।

हमारे समय में बुद्धिजीवियों की भूमिका कम सदिग्ध नहीं है। इस ढोंग को कविताएँ उजागर करती हैं।

दामोदर - बंगाल का अभिशाप, सुनो विद्याधर, मैं किस बात पर हँसूँ, कोरे कागज पर हस्ताक्षर, मेरे समय में बुद्धिजीवी, एक लड़की दुनिया की अदालत में, विषाक्त दीमकों का कुनबा इस संग्रह की श्रेष्ठ कविताएँ हैं।

कविता पर मुकदमा सीरीज की सभी कविताएँ बेहद धारदार और बोल्ड हैं। इन कविताओं में समकालीनता की बदरंग ध्वनियाँ हैं। इन कविताओं को पढ़ते हुए सहज ही भाषा पर ध्यान जाता है। आपकी भाषा सधी हुई और चुस्त है। कविता में शब्द फालतू नहीं लगते बल्कि उनका सावधानी के साथ उपयोग किया गया है।

कुल मिलाकर यह संग्रह मुझे अच्छा लगा।

शुभकामनाएँ।

 स्वप्निल श्रीवास्तव

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