“आज
जीवन
कठिन से कठिनतर होता जा रहा है। जीते रहने के लिए
लगातार संघर्षरत रहना मजबूरी है। पूँजीवादी
श्रम-विभाजन के इस माहौल में जीवन से रागात्मकता और काव्यबोध लुप्त होते जा रहे
हैं, जीवन में कविता का स्पेस सिकुड़ता चला जा रहा है। ऐसे में आधुनिक जीवन की जटिलता
को कविता के वितान में बाँधना आज की आवश्यकता है।“
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