यह एक सामान्य कथा है, जिसे उपन्यास का रूप दिया गया है। अंकित और बावी जैसे चेहरे हमारे सामने चलते-फिरते रहते हें। उनकी भावनाओं और विचारों को समझने का प्रयास हैं। समाज के लिए एक बड़ी समस्या। इस पर अभी और सोचना है। बच्चों पर कई प्रकार के जुल्म होते हैं- शिक्षा वृत्ति, बेचने, बहलाने-फुसलाने, दुष्कर्म, बाल-मजदूरी और न जाने क्या क्या। इनमें नवजात को फेंकने की भी एक समस्या है। यह बढ़ती जा रही है। वैसे बच्चे पता नहीं कहाँ गुम हो जाते हैं, भीख, वेश्यावृत्ति, किडनी बदलने, चुरा लेने और क्या-क्या। उनके बारे में सोच कर संवेदना चीखती है, आखिर उन बच्चों की नियति क्या बावी की तरह होती हैं अब तो पारियों क्या छोटे मासूम बच्चियों के साथ अमानवीय धृणित कथाएँ रोजमर्रा की घटनाएँ हो गई हैं। कब रुकेगा ऐसी पशुता का खेल। समाचार पत्र और पत्र-पत्रिकाएँ ऐसी घटनाओं से भरी होती हैं। परन्तु साहित्य में यथार्थ के साथ संवेदनाएँ जुड़ती हैं तो कुछ नया आयाम बनता है। युग-बोध से संवेदना जगती है तो वह हमें झकझोड़ती हैं। ऐसे विषय के साथ लिखने की उत्कंठा और तिलमिलाहट को मैं रोक नहीं सका। न सशक्त अभिव्यक्ति न कलम में जोर कुछ वैसा। कथा की बुनावट का चितेरा भी नहीं। कहते हैं कि कबीर को भी उसकी माता ने तालाब के किनारे फेंक दिया था।
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