Saturday, 28 March 2026

आत्म कथ्य

             मैं पेशे से डॉक्टर हूँ और यही चाहती थी कि तन मन से सिर्फ मरीजों की ही सेवा करूँ। पर मेरे मन की बांसिया, बेसुरी ही सही, बजती रही। जो भी भाव मन में उठे मैं उन्हें पन्नों पर उतारती रही। मालूम नहीं ये कविता है, नज़्म है या गीत है। बस मन के उद्गार हैं। सायास कुछ भी नहीं लिखा। कभी पूर्ण सूर्यग्रहण को देखकर चाँद से जलन हुई कि उसके आगोश में सूरज क्यों है और कभी पूनम का पूरा चाँद देखकर ख्वाहिश हुई कि काश वो आधा मेरी गोद में आ जाता।

लिखते वक्त शब्दों को चुराया नहीं कभी पर मेरी लेखनी ग़ालिब और गुलज़ार से बहुत प्रभावित रही। जो भी लिखा, कई लोग इसे स्वान्तः सुखाए भी कहते हैं। दरअसल मैंने मरीजों की सेवा भी तो अपने सुख के लिए की और इसका प्रतिफल ये रहा कि मरीजों को स्वास्थ्य लाभ के साथ-साथ खुशी भी दी। अपनी कविताओं के लिए भी यही कह सकती हूँ। आज जिस संताप में हर कोई जल रहा है उनके लिए शीतल लेप की तरह होंगी मेरी नज़्में। मुझे यकीन है कि आप सबको जरूर पसन्द आएँगी।

आखिरी में अपने इस सफर में अपने जीवन साथी अरुण को याद करना नहीं भूल सकती। उसके बिना कुछ भी सम्भव नहीं था। दरअसल हम दोनों के नाम एक ही कविता है, वो अरुण और मैं उसकी पहली किरण।

-    उषा अरुण

डॉ. अमरजीत कौंके

 


डॉ. अमरजीत कौंके (जन्म: 1964, लुधियाना) समकालीन हिन्दी और पंजाबी साहित्य के महत्वपूर्ण कवि, अनुवादक और संपादक हैं। आपने एम.ए. (पंजाबी) तथा पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की है और वर्तमान में लेक्चरर के रूप में कार्यरत हैं।

डॉ. कौंके की रचनात्मकता का विस्तार हिन्दी और पंजाबी दोनों भाषाओं में समान रूप से दिखायी देता है। पंजाबी में उनके प्रमुख काव्य-संग्रह हैंनिर्वाण दी तलाश , द्वंद कथा, यकीन, शब्द रहिणगे कोल, स्मृतियां दी लालटेन, प्यास तथा इस धरती ते रहिन्दिआं। वहीं हिन्दी में उनके चर्चित काव्य-संग्रह हैंमुट्ठी भर रौशनी, अँधेरे में आवाज़, अंतहीन दौड़, बन रही है नई दुनिया और आकाश के पन्ने पर।

एक सशक्त अनुवादक के रूप में उन्होंने हिन्दी और पंजाबी के बीच सेतु का कार्य किया है। अब तक लगभग 40 पुस्तकों का अनुवाद प्रकाशित हो चुका है, जिनमें हिन्दी के प्रमुख लेखकों की कृतियाँ शामिल हैं। इसके अतिरिक्त बच्चों के लिए कविताओं और कहानियों की पाँच पुस्तकें भी प्रकाशित हैं।

संपादन के क्षेत्र में भी आपका महत्वपूर्ण योगदान है। वर्ष 2003 से आप पंजाबी की त्रैमासिक पत्रिका प्रतिमानका निरन्तर संपादन कर रहे हैं।

आपको साहित्य अकादमी, दिल्ली द्वारा साहित्य अकादमी अनुवाद पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। इसके साथ ही प्यास, मुट्ठी भर रौशनी और आकाश के पन्ने पर जैसी कृतियों के लिए भाषा विभाग, पंजाब द्वारा सर्वोत्तम पुस्तक पुरस्कार प्राप्त हुए हैं। गुरु नानक विश्वविद्यालय, अमृतसर सहित अनेक प्रतिष्ठित संस्थानों ने भी आपको सम्मानित किया है।

ईमेल: pratimaan@yahoo.co.in


सुशील सरित


सुशील कुमार सक्सेना (साहित्यिक नाम: सुशील सरित) हिन्दी साहित्य जगत के एक बहुआयामी, सशक्त और अत्यन्त सक्रिय रचनाकार हैं। विगत लगभग पाँच दशकों से वे साहित्य, मंच और प्रसारण माध्यमों से निरन्तर जुड़े हुए हैं।

अब तक उनकी 3500 से अधिक रचनाएँ जिनमें कविता, कहानी, नाटक, व्यंग्य आदि विविध विधाएँ शामिल हैं देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। साहित्य के क्षेत्र में उनका योगदान अत्यन्त व्यापक है, जिसका प्रमाण उनकी 78 प्रकाशित पुस्तकें हैं।

आकाशवाणी के हिन्दी भाषी केंद्रों से उनके 88 नाटक प्रसारित हो चुके हैं, जो सॉफ्टवेयर आर्काइव में स्थायी रूप से सुरक्षित हैं। उनकी रचनात्मकता का वैश्विक प्रभाव भी उल्लेखनीय है यूके, जापान और भारत के विभिन्न पाठ्यक्रमों में उनकी 61 रचनाएँ शामिल की जा चुकी हैं।

सम्मानों की दृष्टि से भी वे अत्यन्त समृद्ध हैं। उन्हें उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा तीन बार सम्मानित किया गया है, जिनमें वर्ष 2022 का प्रतिष्ठित साहित्य भूषण सम्मान (₹2,50,000) विशेष उल्लेखनीय है। इसके अतिरिक्त उन्हें राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चार दर्जन से अधिक पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं।

उनकी रचनात्मक उपस्थिति केवल साहित्य तक सीमित नहीं है वे एक सफल उद्घोषक, कवि, लेखक और गायक के रूप में भी विख्यात हैं। वे पिछले 32 वर्षों से अंतर्राष्ट्रीय ताज महोत्सव के स्थायी मुख्य उद्घोषक रहे हैं। साथ ही, उनकी रचनात्मक प्रतिभा फिल्म जगत तक भी पहुँची है, जहाँ फीचर फिल्म ‘जीवन चक्र’ में उनके चार गीत शामिल हैं।

मंचीय गतिविधियों में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान है उनके एक दर्जन से अधिक नाटक एवं नृत्य-नाटिकाएँ मंचित हो चुकी हैं।

व्यवसायिक रूप से वे पूर्व में प्रवक्ता एवं बैंक कर्मी रहे हैं और वर्तमान में स्वतंत्र रूप से साहित्य एवं संस्कृति के क्षेत्र में सक्रिय हैं।

ईमेल: sushilsaxenasarit@gmail.com


Saturday, 21 February 2026

डॉ. शशि गोयल

 मार्च 1944 को मथुरा में जन्मी डॉ. शशि गोयल हिंदी साहित्य जगत की प्रतिष्ठित एवं बहुआयामी रचनाकार हैं। बचपन से ही पठन-पाठन में गहरी रुचि रही और अल्पायु में ही लेखनी ने आकार लेना शुरू कर दिया। शिक्षा के क्षेत्र में उन्होंने एम.ए. (अंग्रेज़ी)एम.ए. (हिंदी) तथा हिंदी में पी-एच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त कीं।

कहानीकवितालेखव्यंग्ययात्रा-वृत्तांत तथा विशेष रूप से बाल साहित्य में आपका उल्लेखनीय योगदान रहा है। अब तक आपकी 55 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। बाल कथाएँबाल गीतबाल उपन्यासकथा-संग्रहकाव्य-संग्रहव्यंग्य-संग्रहसंस्मरण और शोधपरक कृतियों के माध्यम से आपने साहित्य की विविध विधाओं को समृद्ध किया है। आपकी चर्चित कृतियों में बादल की सैरसोने का पेड़श्रेष्ठ बाल कहानियाँभूतवाले पंडित जीबदल गया मनसूरज को भी लगती सर्दीगोलू-भोलू और जंगल का रहस्यमैं अकेलीनेह बंध की देहरीमॉरीशस यात्राकैलाश मानसरोवरइंसान कहीं केधूप प्यारी बच्ची सीछिटके हुए लोग आदि विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

साहित्यिक योगदान के लिए आपको देश की अनेक प्रतिष्ठित संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया गया है। जवाहरलाल नेहरू बाल साहित्य अकादमी द्वारा साहित्य मनीषी सम्मानउत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा साहित्य भूषण एवं सुभद्रा कुमारी चौहान महिला बाल साहित्य सम्मानतथा मैं अकेली को पुरस्कृत किया जाना उनकी उपलब्धियों में प्रमुख है। इसके अतिरिक्त अनेक राष्ट्रीय साहित्यिक संस्थाओं ने समय-समय पर उन्हें सम्मानित किया है।

डॉ. शशि गोयल की रचनाएँ संवेदनशीलतासहज भाषामानवीय मूल्यों और बाल मन की सरलता को अभिव्यक्त करती हैं। वे निरंतर लेखनरत रहकर हिंदी साहित्य की सेवा कर रही हैं।

संपर्क:
ईमेल: Shashigoyal3@gmail.com


Friday, 13 February 2026

डॉ. उमेशचन्द्र सिरसवारी : बाल साहित्य के सृजनशील हस्ताक्षर

 

डॉ. उमेशचन्द्र सिरसवारी समकालीन हिंदी बाल साहित्य के ऐसे सशक्त रचनाकार हैं, जिन्होंने अपनी रचनात्मक प्रतिभा, शोध-दृष्टि और संपादकीय सक्रियता के माध्यम से हिंदी साहित्य, विशेषतः बाल साहित्य को समृद्ध किया है। उनका जन्म 06 मई, 1983 को उत्तर प्रदेश के जनपद सम्भल के गाँव आटा, तहसील चंदौसी में हुआ। ग्रामीण परिवेश में पले-बढ़े डॉ. सिरसवारी ने जीवन के प्रारंभिक अनुभवों से संवेदनशीलता, संस्कार और सामाजिक यथार्थ की गहरी समझ अर्जित की, जो आगे चलकर उनके साहित्य का आधार बनी।
  उच्च शिक्षा के प्रति विशेष लगाव रखते हुए उन्होंने एम.ए. हिंदी, एम.ए. संस्कृत तथा बी.एड. की उपाधियाँ प्राप्त कीं। हिंदी विषय में नेट-जेआरएफ उत्तीर्ण कर उन्होंने अकादमिक क्षेत्र में अपनी मेधा का परिचय दिया और तत्पश्चात अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ़ से पी-एच.डी. की उपाधि प्राप्त की। उनका यह शैक्षिक वैभव उनके लेखन को गहराई, शोधपरकता और वैचारिक स्पष्टता प्रदान करता है। वे केवल सृजनधर्मी लेखक ही नहीं, बल्कि गंभीर अध्येता और आलोचनात्मक दृष्टि से संपन्न शोधकर्ता भी हैं।
डॉ. सिरसवारी की लेखन विधाएँ अत्यंत व्यापक हैं। वे बालसाहित्य, कहानी, कविता, आलेख, गीत, शोध आलेख तथा समीक्षा सभी विधाओं में समान अधिकार से लेखन करते हैं। किंतु उनकी विशिष्ट पहचान बालसाहित्य के क्षेत्र में एक समर्पित रचनाकार के रूप में स्थापित हुई है। बाल मनोविज्ञान की सूक्ष्म समझ, सरल एवं प्रवाहपूर्ण भाषा, कल्पनाशीलता और नैतिक-सांस्कृतिक मूल्यों का संतुलित समावेश उनकी बाल रचनाओं की प्रमुख विशेषताएँ हैं।
वर्ष 2021 में प्रकाशित ‘कोरोना काल का सामाजिक सच’ यद्यपि सामाजिक संदर्भों पर आधारित है, परंतु इसमें भी मानवीय संवेदना और सामाजिक चेतना का वह स्वर उपस्थित है, जो बालसाहित्य के लिए आवश्यक मूल्यबोध की पृष्ठभूमि तैयार करता है। वर्ष 2025 में संपादन में प्रकाशित ‘सांस्कृतिक आलोचना के प्रतिष्ठापक आचार्य प्रो. नन्द किशोर पाण्डेय’ उनके शोधपरक लेखन और आलोचनात्मक दृष्टि का प्रमाण है।
प्रकाशनाधीन कृतियों में ‘जन्मदिन का उपहार’ (बाल कहानी संग्रह) विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इसके अतिरिक्त ‘हिंदी कविता और स्त्री विमर्श’ तथा ‘बालसाहित्य : विविध विमर्श’ जैसी कृतियाँ उनके बहुआयामी चिंतन को रेखांकित करती हैं।
डॉ. सिरसवारी की रचनाएँ देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं- अमर उजाला, दैनिक जागरण, जनसत्ता, पंजाब केसरी, नेशनल दुनिया, हरियाणा प्रदीप, इंदौर समाचार, द ग्रामोदय विजन, हाल-ए-बुंदेलखंड, बाल किरण, नव किरण, हँसती दुनिया, बच्चों का देश, अणुव्रत, बाल भारती, बालहंस आदि में प्रकाशित होती रही हैं। इससे उनकी लेखनी की व्यापक स्वीकार्यता का प्रमाण मिलता है। इसके अतिरिक्त साहित्य पीडिया, जनकृति, साहित्य रागिनी, हस्ताक्षर, रचनाकार, साहित्य कुंज, एवीके न्यूज सर्विस, हिंदी समय आदि पत्रिकाओं तथा वेब प्लेटफॉर्म पर भी उनके बालसाहित्य एवं शोध आलेख निरंतर प्रकाशित होते रहे हैं। संपादकीय क्षेत्र में भी उनका अनुभव उल्लेखनीय है। साहित्य रागिनी मासिक वेब पत्रिका, शब्द-सरिता त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका, प्रेरणा अंशु मासिक पत्रिका, अद्भुत इंडिया मासिक समाचार पत्र, द ग्रामोदय विजन साप्ताहिक समाचार पत्र, नव किरण त्रैमासिक पत्रिका तथा बाल किरण द्वैमासिक पत्रिका में सह-संपादक एवं कॉलम संचालन का कार्य करते हुए उन्होंने अनेक नवोदित रचनाकारों को मंच प्रदान किया। उनकी साहित्यिक उपलब्धियों को विभिन्न संस्थाओं ने सम्मानित भी किया है। उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, लखनऊ द्वारा वर्ष 2018 का ‘कृष्ण विनायक फड़के बाल साहित्य समीक्षा सम्मान’ उन्हें प्रदान किया गया, जो बालसाहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान की औपचारिक स्वीकृति है। इसके अतिरिक्त भी उन्हें कई पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। वर्तमान में वे राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत में सहायक संपादक (हिंदी) के पद पर कार्यरत हैं। यह पद उनके साहित्यिक अनुभव, संपादकीय दक्षता और हिंदी के प्रति प्रतिबद्धता का प्रमाण है।
समग्रतः डॉ. उमेशचन्द्र सिरसवारी का व्यक्तित्व सृजन, शोध, संपादन और सांस्कृतिक प्रतिबद्धता का संतुलित समन्वय है। उन्होंने बालसाहित्य को केवल मनोरंजन का माध्यम न मानकर उसे मूल्य-निर्माण, संवेदना-विकास और सामाजिक चेतना के संवाहक के रूप में देखा है। उनकी रचनाएँ बाल मन की सहजता को स्पर्श करती हैं और साथ ही उसे नैतिक, सांस्कृतिक एवं बौद्धिक रूप से समृद्ध करने का कार्य करती हैं। समकालीन हिंदी बाल साहित्य में उनका योगदान निस्संदेह उल्लेखनीय और प्रेरणादायी है।

संपर्क : ग्रा. आटा, पो. मौलागढ़, तह. चंदौसी, जि. सम्भल (उ.प्र)-244412
मो. : 9410852655

पूजा अग्निहोत्री

 4 सितंबर को छतरपुर (मध्य प्रदेश) में जन्मी पूजा अग्निहोत्री समकालीन हिंदी साहित्य की सक्रिय और बहुआयामी रचनाकार हैं। विज्ञान से इंटरमीडिएट, कला संकाय से स्नातक, अंग्रेजी साहित्य में परास्नातक तथा पीजीडीसीए की शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात वे स्वतंत्र लेखन एवं पटकथा लेखन से निरंतर जुड़ी हुई हैं।


पूजा अग्निहोत्री की लेखनी कथा, कविता, लघुकथा, नज़्म, समीक्षा और आलोचना—सभी विधाओं में समान अधिकार से संचरित होती है। उनकी कथेतर पुस्तक लोक के राम (2025, स्पर्श प्रकाशन, पटना) उनके वैचारिक और शोधपरक लेखन का प्रमाण है। इसके अतिरिक्त उनकी रचनाएँ देश की अनेक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं—गृहशोभा, लघुकथा कलश, विश्वगाथा, स्रवन्ति, दृष्टि, क्षितिज, पलाश, साहित्य कुञ्ज, पुरवाई आदि—में निरंतर प्रकाशित होती रही हैं।

समाचार-पत्रों जैसे दैनिक जागरण, हिंदुस्तान, राजस्थान पत्रिका, पंजाब केसरी, दैनिक नवभारत तथा हरिभूमि में उनके साहित्यिक-सामाजिक आलेख, समीक्षाएँ और आलोचनात्मक लेख प्रकाशित होते रहे हैं। उनकी रचनाएँ तेलुगु, उड़िया, कन्नड़ और नेपाली सहित विभिन्न भारतीय भाषाओं में अनूदित होकर व्यापक पाठक-वर्ग तक पहुँची हैं।

वे ‘काव्य पुंज’, ‘काव्य निहारिका’ और ‘दास्तान-ए-किन्नर’ जैसे साझा संकलनों का हिस्सा रही हैं। यूट्यूब चैनलों (किडलॉजिक्स, बैडटाइम स्टोरी) के लिए पटकथा लेखन के माध्यम से उन्होंने डिजिटल मंच पर भी अपनी सृजनात्मक उपस्थिति दर्ज की है।

उनकी साहित्यिक प्रतिभा को अनेक मंचों पर सम्मानित किया गया है। साहित्य संवेद साहित्यिक संस्था की फणीश्वर रेणु स्मृति क्विज में द्वितीय स्थान, विश्व गाथा साहित्यिक पत्रिका द्वारा सम्मान, ‘नया लेखन, नया दस्तख़त’ लघुकथा प्रतियोगिता में ‘गर्व’ का पुरस्कृत होना, कथा समवेत पत्रिका की अखिल भारतीय कहानी प्रतियोगिता-2022 में ‘नई माँ’ को प्रोत्साहन पुरस्कार, तथा हिंदी अकादमी मुंबई द्वारा आयोजित लघुकथा लेखन प्रतियोगिता-2025 में प्रथम स्थान उनके सृजन की स्वीकृति के प्रमाण हैं।

संवेदनशीलता, सामाजिक सरोकार और स्त्री-अनुभूति की गहन अभिव्यक्ति उनकी रचनाशीलता की प्रमुख विशेषताएँ हैं। वे अपने समय और समाज की जटिलताओं को सहज, प्रभावी और मानवीय दृष्टि से अभिव्यक्त करती हैं।

संप्रति:
उर्जानगर ‘C’ ब्लॉक, बिजुरी, अनूपपुर (मध्य प्रदेश) में निवासरत रहकर स्वतंत्र लेखन एवं पटकथा लेखन में सक्रिय।


Thursday, 12 February 2026

सुरेन्द्र प्रजापति

सुरेन्द्र प्रजापति का जन्म 8 अप्रैल 1985 को बिहार के गया ज़िले के ग्राम असनी में हुआ। ग्रामीण परिवेश में पले-बढ़े सुरेन्द्र जी की संवेदनशीलता और लेखन की जड़ें मिट्टी, लोकजीवन और आम आदमी के संघर्षों से गहराई से जुड़ी हैं।


मैट्रिक तक शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी उन्होंने स्वाध्याय के माध्यम से साहित्य से अपना रिश्ता मजबूत किया। साहित्यिक पुस्तकें पढ़ना, कहानियाँ और कविताएँ लिखना तथा गाँव की चहल-पहल और सामाजिक सरोकारों को शब्द देना उनका प्रिय कार्य रहा है।

उनकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं — जैसे ग्रामीण चहल-पहल, समालोचन, पुरवाई, पहलीबार आदि — में प्रकाशित होती रही हैं। उनकी कविताओं में जीवन की सादगी, संघर्ष, उम्मीद और मिट्टी की सोंधी महक साफ झलकती है।

उनका प्रथम कविता संग्रह “उम्मीद की किरणें” वर्ष 2026 में न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन से प्रकाशित हुआ।
“मिट्टी की चीख” उनका नवीन काव्य-संकलन है, जिसमें समाज, संवेदना और मनुष्य की अंतरात्मा की आवाज़ को मार्मिक अभिव्यक्ति मिली है।

संपर्क:
ग्राम–असनी, पोस्ट–बलिया, थाना–गुरारू, जिला–गया, बिहार (824205)
ईमेल: surendraprar01@gmail.com
मो.: 7061821603 / 9006248245

Wednesday, 11 February 2026

अर्चना त्यागी


मुज़फ्फरनगर, उत्तर प्रदेश में जन्मी अर्चना त्यागी साहित्य और शिक्षादोनों क्षेत्रों की सक्रिय, संवेदनशील और बहुआयामी हस्ताक्षर हैं। एम.एससी. (रसायन विज्ञान) एवं एम.एड. शिक्षित अर्चना जी लेखन, पठन-पाठन और रचनात्मक गतिविधियों में विशेष रुचि रखती हैं।

बाल साहित्य, कहानी और लघुकथा लेखन में आपकी विशिष्ट पहचान है। आपकी प्रमुख कृतियों में चीनी का पेड़ (बाल कहानी संग्रह), दीवार के पार (पुरस्कृत कहानी संग्रह), सपने में आना माँ (पुरस्कृत लघुकथा संग्रह), अनवरत, काव्य अमृत, कथा संचय, और मानवता जीत गयी, सरहद पार (कहानी संग्रह, इंक पब्लिकेशन), मुसीबतें पर्वत सही (कविता संग्रह), तीसरा मोड़ (कहानी संग्रह) सहित अनेक साझा एवं एकल संकलन शामिल हैं।

आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में नियमित रूप से प्रकाशित होती रही हैं। दिल्ली प्रेस की लोकप्रिय पत्रिकाओंगृहशोभा, सरिता, चंपक आदि में भी आपका सतत लेखन प्रकाशित होता रहा है।

आपकी कहानियों का नियमित प्रसारण आकाशवाणी जोधपुर से होता रहा है तथा आकाशवाणी और दूरदर्शन देहरादून से भी रचनाओं का प्रसारण हुआ है। वर्ष 2023 से आप हिंदी लेखक परिवार मंच पर स्वर कलाकार के रूप में सक्रिय हैं।

अनेक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय सम्मानों से अलंकृत अर्चना जी को उत्कृष्ट बाल साहित्यकार सम्मान (2024)अणुव्रत विश्व भारती,
वैश्विक साहित्य सम्मान (2024)निर्दलीय प्रकाशन,
सर्वश्रेष्ठ साहित्य सम्मान (2024)नारी अस्मिता पत्रिका (सपने में आना माँ हेतु),
जयपुर साहित्य सम्मान (2025)जयपुर साहित्य संगीति (दीवार के पार हेतु),
राष्ट्र शक्ति शिरोमणि सम्मान (2025)संपर्क क्रांति परिवार,
मारवाड़ गौरव सम्मान (2025)मारवाड़ सिविल सोसाइटी,
अभिनय कला रत्न सम्मान (2025)हिंदुस्तानी भाषा अकादमी एवं हम सब साथ साथप्रोडक्शन,
तथा सुभद्रा कुमारी चौहान सम्मान (2022)गुफ्तगू संस्था सहित अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित किया गया है।

संप्रति आप सहायक आचार्या पद से स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति के उपरांत स्वतंत्र लेखिका, स्वर कलाकार, मंच संचालक एवं कैरियर परामर्शदाता के रूप में सक्रिय हैं।

Tuesday, 10 February 2026

शिवचरण सिंह चौहान


(जन्म: 26 फ़रवरी 1959, कानपुर)

एम.ए.बी.एड शिक्षित शिवचरण सिंह चौहान एक वरिष्ठ पत्रकारसाहित्यकार एवं जनकवि हैं। दैनिक स्वतंत्र भारतदैनिक जागरण तथा दैनिक अमर उजालाकानपुर में लगभग 28 वर्षों तक समाचार संपादन एवं पत्रकारिता से जुड़े रहे। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन एवं पत्रकारिता में सक्रिय हैं।

बाल साहित्य के क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थानबाल कल्याण संस्थाननागरी बाल साहित्य संस्थान सहित अनेक प्रतिष्ठित संस्थाओं द्वारा सम्मानित। अब तक उनकी चालीस से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैंजिनमें 16 बाल साहित्य की पुस्तकें विशेष रूप से चर्चित हैं।

दो हजार से अधिक रचनाएँ धर्मयुगनवनीतकादंबिनीआजकलगगनांचलबालभारतीनंदनपरागसाहित्य अमृत आदि प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित। समाज में जनकवि के रूप में लोकप्रिय।

कलासंस्कृतिसाहित्यसंगीत तथा पर्यावरण चेतना और लोक साहित्य के प्रचार-प्रसार के प्रति समर्पित।

📍 कानपुर देहातउत्तर प्रदेश
✉️ shivcharany2k@gmail.com

Monday, 19 January 2026

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 Lokoday Prakashan – Independent Publisher & Bookstore

Lokoday Prakashan is an independent Indian publishing house and bookseller dedicated to meaningful, accessible and socially relevant literature. We specialize in Hindi, English and selected regional language books across genres including literature, social thought, education, history, culture, research works, religion, philosophy etc. and competitive exam resources.

With a strong focus on quality publishing and reader satisfaction, we offer both new releases and carefully stored backlist titles directly from our warehouse. Every book is sourced from the publisher or our own editions, ensuring authenticity and excellent condition. We maintain careful storage, quality checks, and secure packaging so that every order reaches readers safely and on time.

 

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Lokoday Prakashan Pvt. Ltd.

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छोटे पापा

   यह एक सामान्य कथा है, जिसे उपन्यास का रूप दिया गया है। अंकित और बावी जैसे चेहरे हमारे सामने चलते-फिरते रहते हें। उनकी भावनाओं और विचारों को समझने का प्रयास हैं। समाज के लिए एक बड़ी समस्या। इस पर अभी और सोचना है। बच्चों पर कई प्रकार के जुल्म होते हैं- शिक्षा वृत्ति, बेचने, बहलाने-फुसलाने, दुष्कर्म, बाल-मजदूरी और न जाने क्या क्या। इनमें नवजात को फेंकने की भी एक समस्या है। यह बढ़ती जा रही है। वैसे बच्चे पता नहीं कहाँ गुम हो जाते हैं, भीख, वेश्यावृत्ति, किडनी बदलने, चुरा लेने और क्या-क्या। उनके बारे में सोच कर संवेदना चीखती है, आखिर उन बच्चों की नियति क्या बावी की तरह होती हैं अब तो पारियों क्या छोटे मासूम बच्चियों के साथ अमानवीय धृणित कथाएँ रोजमर्रा की घटनाएँ हो गई हैं। कब रुकेगा ऐसी पशुता का खेल। समाचार पत्र और पत्र-पत्रिकाएँ ऐसी घटनाओं से भरी होती हैं। परन्तु साहित्य में यथार्थ के साथ संवेदनाएँ जुड़ती हैं तो कुछ नया आयाम बनता है। युग-बोध से संवेदना जगती है तो वह हमें झकझोड़ती हैं। ऐसे विषय के साथ लिखने की उत्कंठा और तिलमिलाहट को मैं रोक नहीं सका। न सशक्त अभिव्यक्ति न कलम में जोर कुछ वैसा। कथा की बुनावट का चितेरा भी नहीं। कहते हैं कि कबीर को भी उसकी माता ने तालाब के किनारे फेंक दिया था।

Sunday, 21 December 2025

आँख भर आकाश

 

“आज जीवन कठिन से कठिनतर होता जा रहा हैजीते रहने के लिए लगातार संघर्षरत रहना मजबूरी हैपूँजीवादी श्रम-विभाजन के इस माहौल में जीवन से रागात्मकता और काव्यबोध लुप्त होते जा रहे हैं, जीवन में कविता का स्पेस सिकुड़ता चला जा रहा है। ऐसे में आधुनिक जीवन की जटिलता को कविता के वितान में बाँधना आज की आवश्यकता है।“

 

https://www.amazon.in/gp/product/9387149528/

Tuesday, 9 December 2025

कवि, कविता और मेरी बात

अगर जन्म लिया है तो चुनौतियाँ आनी ही हैं और उनसे निबटना भी लाजमी है। पर किसी ऐसे व्यक्ति के सम्बन्ध में कुछ लिखना और वह भी शब्द-विस्तार की सीमा-रेखा में, जिसे आप लगभग अद्योपाँत जानते हों, भी एक बड़ी चुनौती है; क्योंकि ज़्यादा जानकारी होने पर विचार गड्ड-मड्ड होने लगते हैं और लेखन सौष्ठव बिगड़ता है, पर वह चुनौती मुझे दी गई है जो स्वयम् न कवि है न लेखक अर्थात् सौंपे गए कार्य को अंजाम देने हेतु आवश्यक और पर्याप्त उपकरणों के अभाव में लगभग अक्षम। पर कोशिश तो की ही जानी चाहिए सो कोशिश कर रहा हूँ।

इस काव्य खण्ड के रचयिता श्री ब्रह्मानन्द दुबे जैविक रूप से मेरे पूज्य चाचा थे अर्थात् मेरे पूज्य पिताजी के छोटे भाई। जब वह हाई स्कूल की परीक्षा दे रहे थे उसी दौरान उनके पूज्य पिताजी अर्थात् मेरे पूज्य बाबा की अचानक मृत्यु हो गई। किसी तरह उनको परीक्षा देने हेतु भेजा गया। ज़ाहिर है ऐसे माहौल में परीक्षा किस मनो-स्थिति में दी होगी, पर फिर भी शेष पर्चे भी लिखे और उत्तीर्ण भी हुए, द्वितीय श्रेणी में- जो उस ज़माने के हिसाब से सम्मानपूर्ण था क्योंकि उस ज़माने में (चालीस के दशक में) प्रथम श्रेणी बँटती नहीं थी और कला क्षेत्र में तो बहुत ही प्रतिभाशाली की आती थी। यह उनकी अदम्य संकल्प शक्ति का पहिला प्रमाण था जो जीवन के आख़िरी पल तक उनके साथ रही, उन्हें ज़िद्दीका विशेषण दिलाने की सीमा तक और उसके बाद उन्होंने आगे पढ़ने से मना कर दिया और बावजूद मेरे पूज्य पिताजी, जो अब उनके लिए पिता तुल्य थे तथा अपनी परम पूज्या माँ के पूरा ज़ोर देकर समझाने पर भी नहीं माने। कालान्तर में उन्होंने पहिले उत्तर प्रदेश खाद्य विभाग और फिर रेलवे में सेवा की जहाँ से वे सेवानिवृत हुए।

सेवा प्रारम्भ करने के बाद अवसर आया विवाह का, जिसके लिए उन्होंने जो की तो उसे हाँ में कोई तब्दील न करा सका; वह पूज्य माँ भी, जिनके लिए उनके भाव थे: भोली भाली सरलता की त्यागमयी सौम्या मूर्ति जिनमें मुझे देवी माँ के साक्षात दर्शन होते थे...।“

देश भक्ति, सामाजिक चेतना, कलाओं के प्रति स्वभाविक रुझान के साथ स्वयम्-प्रगल्ब्ध्ता से बचने के पारम्परिक संस्कार पूरे परिवार में थे जिसकी एक बानगी उन्हीं के शब्दों में: मेरे ताऊजी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे- 15 अगस्त को देश स्वाधीन हुआ- इस अवसर पर ताऊजी ने मुझसे भारत माँ का भित्ति चित्र बनवाया, उसकी पूजा-आरती करके प्रसाद वितरण करते हुए ख़ुशी के साथ बोले- आज मेरा मनोरथ पूर्ण हुआ, भारत माता की जय।

स्पष्ट है देश के लिए त्याग किया गया था, पर कोई आडम्बर नहीं और बालक ब्रह्मानन्द में भित्ति चित्र बनाने की क्षमता थी। दिखावे से दूर रहने की प्रवृति ने नुक़सान बहुत किया और उनका चित्रित किया हुआ केवल एक चित्र धूल-धूसरित अवस्था में मुझे हस्तगत हो पाया। अपने बाल साथियों के साथ पहिले बाल विनोद पुस्तकालयकी स्थापना की और एक क्लब भी बनाया गया जिसका एक अभूतपूर्व नाम रखा गया: गोबर क्लब। गोबर क्लब के उद्देश्य, संस्थापकों के ही शब्दों में:-

गौरव ओज बालकों में

भरने को राष्ट्र प्रेम का भाव,

गोबर क्लब साकार हुआ है,

लेकर अपना एक स्वभाव।“

और फिर थोड़ा वय प्राप्त करने पर द वीणापाणि म्यूज़िक अकादमीकी स्थापना, जिसके माध्यम से कन्नौज नगरी में स्तरीय संगीत सम्मेलन आयोजित हुए, के बाद जब वे दिल्ली आए तो उनकी सांस्कृतिक, कलात्मक अभिरुचियों को विस्तार मिला जिसका सबसे बड़ा कारण और सहयोग रहा उनके अग्रज श्री कृष्णानन्द दुबे और उनकी संस्था, इण्डियन सेण्टर फ़ार कल्चरल इंटिग्रेशनका। पर अभी तक उनके कवि स्वरूप का प्रादुर्भाव नहीं हुआ था। लिखते थे: पर कविता नहीं, संस्मरण या हितोपदेश प्रकार के लेख जो स्वयम् में अनन्य प्रकार की अनुभूतियाँ समेटे हैं और शैली तथा दृष्टिकोण में अनूठी हैं (उनका प्रकाशन भी करने की योजना है)। पर मुझे याद पड़ता है कि धीरे-धीरे उनकी अन्य गतिविधियाँ धीमी पड़ती गयीं और कागज़ क़लम के प्रति उनका रुझान बढ़ता गया और इसी मध्य कविता ने जन्म लिया जो बढ़ते-बढ़ते आज चौदह जिल्दों में है जिसके कलेवर का अन्दाज़ इस तथ्य से लगा सकते हैं कि प्रस्तुत कविताएँ मात्र एक जिल्द की आधी हैं। उन्होंने लिखा और ख़ूब लिखा, सभी विषयों पर लिखा। न विषय पारम्परिक, न भाषा, न शैली साँचाबद्ध, पर समझने के लिए बहुत कुछ है और इसका जो विश्लेषण उनके परम प्रिय मित्र श्री हरिहर नाथ भट्टाचार्य ने किया उससे सही और बेहतर आँकलन उनके कृतित्व का नहीं हो सकता। श्री भट्टाचार्य जी ने लिखा था: श्रद्धेय ब्रह्मानन्द!

बर्षों के अध्ययन एवम् तर्क अनुभव से मैं जहाँ जिस बिन्दु पर पहुँचता हूँ- आपके निर्मल हृदय में वह ग्राह्य सत्य वर्षों पूर्व अनायास ही प्रतिबिम्बित हो चुका होता है।

उन्होंने स्वयं भी लिखा है:-

मात्राओं का नहीं हूँ ज्ञाता प्रबोधा,

पर भावनाओं को हूँ संजोता।

पर उनकी सर्जनात्मकता आगे चलकर कविता पर ही क्यों केन्द्रित हो गई? इसका उत्तर सीधे तो नहीं मिला पर मैं लगभग सही अनुमान लगा सकता हूँ।

प्रारम्भ में तो कारण रहा होगा, जैसा उन्होंने लिखा- साहित्यिकी लेखन क्रिया एक ऐसी ज्ञान-यज्ञ विधा है जिसमें विविध सामग्रियों की आवश्यकता नहीं पड़ती। मात्र विनायकी- लेखनी, पत्र पृष्ठ व मातु सरस्वती उद्भूत उद्गारों की कृपा वांछित।

ध्यान दीजिए: सिर्फ़ लेखनी नहीं विनायकीलेखनी और जितना वह लिख गए उससे यही लगता है कि ऊनकी लेखनी पर गणेश कृपा ही थी जो इस गति से लिख पाए। ऐसे सैकड़ों प्रयोग उनकी शब्दावली में हैं। उस दिन प्रूफ़ रीडिंग करते समय आटे रोटी के लिए एक शब्द आया मधुकर’, अजीत और मैं दोनों चक्कर में पड़ गए: यहाँ मधुकर कैसे? याद आया साधु जब भिक्षा माँगते हैं तो उसे मधुकरीभी कहते हैं। तब समझ में आया कि आटा रोटी के लिए मधुकर कहाँ से आया। ऐसे कई प्रयोग उनके लेखन में हैं।  

परन्तु उनके कविता लेखन में समय के साथ एक कारण और जुड़ गया। ज़िद्दी तो वे थे ही यानी लिए गए निर्णय पर पुनर्विचार करने का कोई कारण उनकी समझ में आना लगभग असम्भव, उस पर तुर्रा यह कि स्पष्ट भाषी; यानी करेला और  नीम चढ़ा। फलस्वरूप उनके साथ उसी की निभ पाती थी जो या तो उन्हें समझे या स्नेह करे। तीसरा कारण, जो सामान्यतया होता है अर्थात् स्वार्थ सिद्धि, सो  स्वार्थी लोग उनको फूँटी आँख न भाते थे इसलिए मतलबी लोगों की दाल गल नहीं सकती थी। उन्होंने लिखा, जो स्वाभिमानी होगा, वह ईमानदार होगा, स्पष्टवादी होगा और संतोषी होगा। वो चाटुकारिता में विश्वास नहीं रखता।

ऐसे में परिचितों का दायरा संकीर्ण होते जाना स्वाभाविक था। दूसरे अपनी जन्म नगरी से अत्यधिक प्रेम होने के कारण उन्होंने दिल्ली में कोई ठिकाना नहीं बनाया और यही विचार रखा कि सेवानिवृत्ति पश्चात अपनी जन्म नगरी में ही रहेंगे। फलतः 65 वर्ष की आयु में वे दिल्ली छोड़कर कन्नौज आ गए- ऐसा निर्णय जिसको उन्होंने, आदत मुताबिक़, निभाया तो पर जो उन्हें आमरण टीस पहुँचाता रहा। ज़ाहिर है: जो कन्नौज वह छोड़कर गए थे वह अब नहीं रहा था, रहता भी नहीं और वह स्वयम् भी 45 साल से अधिक का समय महानगरीय संस्कृति में गुजारने के बाद कस्बायी संस्कृति के अभ्यस्त नहीं रहे थे। ऐसा नहीं कि वह इस नज़ाकत को समझते नहीं थे पर वह इसके साथ समझौता नहीं कर पाए क्योंकि समझौता करना उनके स्वभाव का अंग नहीं था। उनके संगी-साथी अब थे नहीं और अपने विचारों और सबसे बड़ी बात, अपनी उम्र के कारण जिस शिष्टाचार और सम्मान की अपेक्षा वह करते थे उसके लिए कन्नौज वासियों के पास समय नहीं था और समय इसलिए नहीं था क्योंकि स्वार्थ सिद्धि नहीं होनी थी। जहाँ भाव यह हों:

जिनमें नैतिकता होती

उनमें मानवता होती

आध्यात्मिकता उनमें प्रकटती

राष्ट्रीयता भी पनपती

वहाँ स्वार्थ का स्थान कहाँ ?

आगे बढ़ने से पहले यह स्पष्ट करना समीचीन होगा और यदि यह स्पष्टीकरण न दिया जाए तो उनके कृतित्व के साथ अन्याय होगा कि उनका लेखन अकेलेपन की उपज नहीं है और न ही वह किसी के प्रति आक्रोश या अपनी पीड़ा का उदबोधक है। आक्रोश है तो नैतिक मूल्यों के ह्रास पर और पीड़ा है तो सामाजिक कृतघ्नताओं के प्रति, इसमें व्यक्तिगत कुछ भी नहीं है। सही तो यह है कि अकेलेपन को उन्होंने सकारात्मक उपादान के रूप में इस्तेमाल कर लिया क्योंकि इसी से उनकी लेखनी विनायकी लेखनीबन पाई।

नैतिकता उनके लिए व अधिकतर परिवारीजनों के लिए, केवल आडंबर नहीं था। उन्होंने ब्रह्मचर्य व्रत लिया तो उसको पूरी निष्ठा के साथ निभाया और यह मैं पूरी सत्यता के साथ कह सकता हूँ इसलिए नहीं कि मैं उनका भातृज हूँ। भगवद भजन, संगीत और लेखन के अतिरिक्त उनके केवल एक ही व्यसन था: भोजन। परिणामस्वरूप पेट की छोटी-मोटी समस्याओं के अतिरिक्त वह स्वस्थ ही रहे। हाँ वह आजीवन एक किडनी पर ही गुज़ारा करते रहे क्योंकि उनकी एक किडनी जन्म से ही सूखी हुई थी और यदि उनको कभी अस्पताल ले जाना पड़ता था तो इसी कारण। पर वहाँ से भी डायलिसिस का अवलंबन लिए बिना वह लौट आते थे।

धीरे-धीरे कविता ही उनकी संगिनी बन गई। वे एक वाक्य अक्सर कहने लगे थे: चमत्कार को नमस्कार है। मैं प्रारम्भ से उनसे यह कहता रहा कि अपनी कविताओं को प्रकाशित करवाइए या मुझे अनुमति दीजिए और वह यही उत्तर देते मैं ज़रा और सुधार लूँ और सुधारने के साथ एक और कविता आ जाती। जब वह अन्तिम बार अस्पताल गए और उनको भान हो गया कि अब वह इस शरीर में अस्पताल से बाहर न आ पाएँगे तो वह बोले, जो मेरे लिए आदेश नहीं था, पर मैंने सुना, मैं जीना चाहता हूँ क्योंकि मैं अपनी कविताओं के माध्यम से समाज को कुछ देना चाहता हूँ। उन्होंने लिखा भी था:

नैतिकीय सामाजिक क्रान्ति भाव है

मन में,

क्षमतानुसार प्रकट होती वह लेखन में।

-    देवेन्द्र नाथ दुबे